पितृसत्ता और पूंजीवाद के गठजोड़ के खिलाफ अखिल भारतीय किसान महासभा का संघर्ष का संकल्प 

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खबर सच है संवाददाता 
 
हल्द्वानी। अखिल भारतीय किसान महासभा बागजाला कमेटी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर धरना स्थल के सम्मुख एक निजी आवास पर कार्यक्रम आयोजित किया गया।
 
कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए किसान महासभा बागजाला की अध्यक्ष डॉ उर्मिला रैस्वाल ने कहा कि हम यहाँ केवल औपचारिक दिवस मनाने के लिए नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक संघर्ष की परंपरा को याद करने के लिए एकत्र हुए हैं जिसे दुनिया भर की मेहनतकश महिलाओं ने अपने साहस, संगठन और बलिदान से गढ़ा है। मीना भट्ट ने कहा आज दुनिया के बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घराने और सरकारें महिला दिवस को फूलों, विज्ञापनों और प्रतीकात्मक कार्यक्रमों में बदलने की कोशिश करती हैं। लेकिन हमें याद रखना होगा कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की असली जड़ें मजदूर आंदोलनों और समाजवादी संघर्षों में हैं। हेमा आर्य ने कहा 20वीं सदी की शुरुआत में पूंजीवाद का तेजी से विस्तार हो रहा था और लाखों महिलाएँ कारखानों में काम करने लगी थीं। लेकिन उनके लिए परिस्थितियाँ बेहद अमानवीय थीं लम्बे कार्य घंटे, बहुत कम मजदूरी और किसी भी प्रकार के श्रम अधिकारों का अभाव। इसी शोषण के खिलाफ 1908 में हजारों महिला मजदूर सड़कों पर उतरीं। उन्होंने नारा दिया— रोटी, काम के इंसानी घंटे और राजनीतिक अधिकार। यह संघर्ष केवल आर्थिक नहीं था, यह सामाजिक और राजनीतिक समानता का संघर्ष भी था। विमला देवी ने कहा कि मुक्ति को समझने के लिए हमें समाज की आर्थिक संरचना को समझना होगा। इस वर्ग समाज में शोषण का मूल कारण उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व है। महिलाओं के शोषण की शुरुआत तब हुई जब समाज में निजी संपत्ति की स्थापना हुई।नीलम आर्य ने कहा कि महिलाओं की मुक्ति तभी संभव है जब घरेलू कामों को सामाजिक जिम्मेदारी बनायाजाए और महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाया जाए। सुनीता ने कहा कि 21वीं सदी में भी महिलाओं की स्थिति पूरी तरह बराबरी की नहीं है। पूरी दुनिया में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में कम वेतन पाती हैं। असंगठित क्षेत्र में सबसे ज्यादा महिलाएँ काम करती हैं। घरेलू हिंसा व लैंगिक भेदभाव व्यापक है। भारत में यह स्थिति और जटिल है क्योंकि यहाँ वर्ग, जाति और पितृसत्ता का गठजोड़ काम करता है। इस कारण दलित, आदिवासी और गरीब महिलाओं को कई स्तरों पर शोषण झेलना पड़ता है।
 
भाकपा माले नैनीताल जिला सचिव डॉ कैलाश पाण्डेय ने कहा कि आज पूंजीवादी व्यवस्था महिला दिवस को एक बाजारू उत्सव में बदलने की कोशिश कर रही है। कॉर्पोरेट कंपनियाँ महिला सशक्ति करण के विज्ञापन देती हैं, लेकिन उन्हीं कंपनियों में महिलाओं को अस्थायी रोजगार, कम वेतन और असुरक्षित परिस्थितियाँ मिलती हैं। हमें याद रखना होगा कि महिला दिवस की असली परंपरा संघर्ष की परंपरा है। महिलाओं की मुक्ति के बिना समाज की मुक्ति संभव नहीं है।और समाज की मुक्ति के बिना महिलाओं की पूर्ण मुक्ति भी संभव नहीं है।
 
महिला दिवस पर महिला आंदोलन की संघर्ष की विरासत को आगे बढ़ाने लिए संकल्प लिए गए:
• हम पितृसत्ता और पूंजीवाद के गठजोड़ के खिलाफ संघर्ष करेंगे।
• हम महिलाओं की समान भागीदारी को हर आंदोलन में सुनिश्चित करेंगे।
• हम एक ऐसे समाज के निर्माण के लिए लड़ेंगे जहाँ शोषण और असमानता समाप्त हो।
 
इस अवसर पर डॉ उर्मिला रैस्वाल, मीना भट्ट, हेमा आर्य, विमला देवी, सुनीता, नीलम आर्य, नंदी देवी, हेमा देवी, अनीता, भावना देवी, भगवती गोस्वामी, मंजू देवी, लीला देवी, ललिता, डॉ कैलाश पाण्डेय, चन्द्रप्रकाश, दीवान सिंह बर्गली, दौलत सिंह, वासुदेव, कमल, नसीम अहमद, इलियास, चंदन सिंह मटियाली, हरि गिरी, मो यासीन, मकसूद, प्रकाश आदि शामिल रहे.
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