सम्पादकीय

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गर्दन के दर्द का इलाज या जिंदगी से खिलवाड़? 

  मनोज कुमार पाण्डे ✍️   मुहावरा है—“नीम हकीम खतरे जान।” लेकिन विडंबना यह है कि आज भी छोटी-मोटी शारीरिक तकलीफ होते ही बड़ी संख्या में लोग प्रशिक्षित और डिग्रीधारी चिकित्सक के बजाय ऐसे लोगों के पास पहुंच जाते हैं, जिनकी चिकित्सा-योग्यता पर ही सवाल खड़े होते हैं। कई बार राहत की उम्मीद में उठाया […]

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छात्रसंघ नहीं, सियासत का अखाड़ा : सत्ता की खनक, संगठन की ताकत और धनबल के बीच निर्दलीय ने बिगाड़ा राजनीतिक दलों का खेल

        छात्रसंघ चुनाव था… लेकिन जिस तरह इस चुनाव में राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े संगठनों ने अपनी ताकत झोंकी, उसे देखकर सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह वास्तव में छात्रों का चुनाव था या राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का एक और अखाड़ा? छात्रों के मुद्दे पीछे छूट गए।   रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता, […]

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मतपत्र फटा, लोकतंत्र का भरोसा भी कहीं न फट जाए 

    कहने को यह छात्रसंघ चुनाव है। कहने को यहां लोकतंत्र की पाठशाला चल रही है। लेकिन तस्वीरें और घटनाक्रम अगर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो उन्हें नजरअंदाज करना भी लोकतंत्र के साथ न्याय नहीं होगा।   मतगणना के बीच मतपत्र फाड़े जाने की घटना सामने आती है। परिणाम पर आपत्ति जताने का […]

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छात्रसंघ चुनाव या सत्ता-विपक्ष की सियासी परीक्षा? प्रशासनिक सख्ती पर उठे सवाल 

            हल्द्वानी। एमबीपीजी कॉलेज में छात्रसंघ चुनाव को लेकर मंगलवार (कल) मतदान होना है। चुनाव भले ही छात्र प्रतिनिधियों के चयन का है, लेकिन जिस तरह इसके आसपास राजनीतिक दलों से जुड़े समर्थकों की सक्रियता, शक्ति प्रदर्शन और आरोप-प्रत्यारोप दिखाई दे रहे हैं, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि […]

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मन आज बहुत विचलित है… गिरजा शंकर जोशी का यूं चले जाना 

        आज मन बहुत बेचैन है… दिल में एक अजीब-सा खालीपन है। आज हमारे बीच से वह शख्स चला गया, जिसे हम पत्रकारों का संरक्षक, मार्गदर्शक और बेहद दिलखुश इंसान मानते थे।   गिरजा शंकर जोशी के अचानक चले जाने की खबर ने भीतर तक झकझोर दिया। मन बार-बार उस शख्स को […]

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राजनीति का गिरता स्तर : विचारों की लड़ाई से शुद्धिकरण और पुतला दहन तक 

      मनोज कुमार पाण्डे ✍️   हल्द्वानी का रामलीला मैदान इन दिनों राजनीतिक टकराव का प्रतीक बन गया है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद तथाकथित भाजपा समर्थित हिन्दू नेताओं द्वारा सभा स्थल के शुद्धिकरण का मामला सामने आया। इसके बाद आरोप-प्रत्यारोप, प्रशासनिक कार्रवाई, धरना-प्रदर्शन, गिरफ्तारी की मांग और […]

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शिक्षक दिवस: जब एक शिक्षक की पहचान बनी राष्ट्र की प्रेरणा 

    मनोज कुमार पाण्डे ✍️   “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥”   शिक्षक केवल वह व्यक्ति नहीं, जो हमें किताबों के पन्ने पढ़ाता है। शिक्षक वह होता है, जो अज्ञान से ज्ञान की ओर, भ्रम से विवेक की ओर और असफलता से संघर्ष की ओर बढ़ना सिखाता है। […]

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32 साल बाद भी सवाल जिंदा है—क्या शहीदों के सपनों का उत्तराखण्ड बन पाया?

    ✍️मनोज कुमार पाण्डे   1 सितंबर 1994… उत्तराखण्ड के इतिहास का वह दिन, जिसे याद करते ही आंखों के सामने आंदोलन, संघर्ष, गोलियों की आवाज और अपने पहाड़ के लिए सब कुछ न्योछावर कर देने वाले आंदोलनकारियों की तस्वीर उभर आती है। खटीमा गोलीकांड से लेकर मसूरी और मुजफ्फरनगर तक राज्य आंदोलन की […]

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बरसे मेघा तो दिल खुश हो गया …   

  तप रही थी धरती और ब्याकुल लोग उम्मीद कर रहे थे कि बरसे मेघा। इसी बीच आज काले-घने बादलों का घिर आना, ठंडी हवाओं का चलना और पहली बारिश की सोंधी महक आते ही तन और मन का झूम उठना, मानो ऐसा लग रहा था कि सावन आया झूम के….   हालांकि मुझे ज्ञात है, […]

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जब सवालों ने शोर को हराया: ईश्वर, तर्क और सभ्य संवाद की एक दुर्लभ बहस 

  कमल किशोर पाण्डे (उप सम्पादक)   20 दिसंबर 2025 को दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुई जावेद अख्तर और मुफ्ती शमाइल नदवी के बीच की बहस केवल “क्या खुदा है?” जैसे एक दार्शनिक प्रश्न तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह हमारे समय के बौद्धिक स्तर, संवाद की संस्कृति और असहमति को व्यक्त करने के […]

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