बरसे मेघा तो दिल खुश हो गया …   

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तप रही थी धरती और ब्याकुल लोग उम्मीद कर रहे थे कि बरसे मेघा। इसी बीच आज काले-घने बादलों का घिर आना, ठंडी हवाओं का चलना और पहली बारिश की सोंधी महक आते ही तन और मन का झूम उठना, मानो ऐसा लग रहा था कि सावन आया झूम के….
 
हालांकि मुझे ज्ञात है, हर खुशी के साथ-साथ अक्सर कुछ परेशानियां भी दस्तक देती हैं। जब पहली बारिश की खुशी उतरती है, तो शहरों की बदहाल व्यवस्था और सड़कों का हाल देखकर मन विचलित हो जाता है.. पर अभी तो झूम उठे बदरा.. सा ही कहने को मन था। राहत थी तपीस से और बारिश की सोंधी महक से तन मचल रहा था, क्योंकि इंतजार भी तो किया बदरा के बरसने का.
 
मन प्रशन्न पर पत्रकारिता का कीड़ा मुझे खसोटने लगा… सोचा तन और मन तो प्रशन्न हुआ लेकिन शहर खुश है या नही.. अथवा आज की बारिश ने कहीं प्रशासन की नींद तो नहीं उड़ा दी होगी.. नाले जाम और पानी सड़कों पर उफान तो नहीं भर रहा होगा…
 
हालांकि यह मेरा विषय नहीं, फिर भी इतना अवश्य कहूंगा कि समय पूर्व तैयारी कर लो..क्योंकि “बरसे मेघा..” यह राग किसी के दिल तक तो ठीक, पर अक्सर मानसून के सुहावने मौसम और उससे जुड़ी कुछ कड़वी वास्तविकताओं (जैसे जलभराव या अन्य समस्याओं) के बनने में देर नहीं लगती।
 
बारिश का बरसना ईश्वर का आशीर्वाद है। जरूरत है तो बस अपनी व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने की। जब हमारी नीतियां और नागरिक जिम्मेदारियां बारिश के पानी की तरह स्वच्छ और पारदर्शी हो जाएंगी, तब सच में ‘बरसे मेघा’ तो हर दिल हमेशा के लिए खुश हो जाएगा।
 
 
 
 
 
 

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