जब सवालों ने शोर को हराया: ईश्वर, तर्क और सभ्य संवाद की एक दुर्लभ बहस 

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कमल किशोर पाण्डे
(उप सम्पादक)
 
20 दिसंबर 2025 को दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुई जावेद अख्तर और मुफ्ती शमाइल नदवी के बीच की बहस केवल “क्या खुदा है?” जैसे एक दार्शनिक प्रश्न तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह हमारे समय के बौद्धिक स्तर, संवाद की संस्कृति और असहमति को व्यक्त करने के तरीके पर भी एक गहरी टिप्पणी थी। 
 
लंबे समय से टीवी चैनलों पर चल रही तथाकथित बहसों में जिस तरह राजनीतिक लोग एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते, गालियाँ देते, बात काटते और ऊँची आवाज़ में खुद को सही साबित करने की होड़ में लगे रहते हैं, उससे आम दर्शक का मन उचट जाना स्वाभाविक है। ऐसी बहसों में न विचार होता है, न सुनने की जगह और न ही किसी निष्कर्ष की संभावना। इसी पृष्ठभूमि में यह बहस एक सुखद अपवाद बनकर सामने आई – शालीन, सभ्य और सचमुच कुछ सुनने-सोचने लायक।
 
यह बहस ईश्वर के अस्तित्व जैसे सदियों पुराने प्रश्न पर थी, लेकिन इसे किसी धर्म विशेष की कट्टर रक्षा या आक्रामक नकार के रूप में नहीं रखा गया। जावेद अख्तर, जो स्वयं को स्पष्ट रूप से नास्तिक मानते हैं, और मुफ्ती शमाइल नदवी, जो एक इस्लामिक स्कॉलर हैं, दोनों ने अपने-अपने दृष्टिकोण को तर्क, अनुभव और दार्शनिक आधार पर सामने रखा। बहस का संचालन सौरभ द्विवेदी ने संतुलन और संयम के साथ किया, जिससे संवाद पटरी से उतरने के बजाय गहराता चला गया।
 
जावेद अख्तर का पक्ष मूलतः तर्क और मानवीय अनुभव पर आधारित था। उनका सवाल सीधा और चुनौतीपूर्ण था कि अगर ईश्वर है, तो वह दिखाई क्यों नहीं देता? बिना किसी प्रत्यक्ष प्रमाण के किसी सर्वशक्तिमान सत्ता पर विश्वास करना उनके लिए तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने विज्ञान की उस पद्धति की ओर इशारा किया जिसमें हर दावा सवालों, परीक्षणों और प्रमाणों से गुजरता है। उनके अनुसार, जहाँ विज्ञान सवाल पूछने की आज़ादी देता है, वहीं धर्म अक्सर सवालों को विराम दे देता है। जावेद अख्तर ने दुनिया में फैले दुःख और अन्याय का उल्लेख करते हुए विशेष रूप से गाज़ा जैसे उदाहरण सामने रखे, जहाँ मासूम बच्चों की मौतें रोज़ की सच्चाई हैं।
 
उनका तर्क था कि यदि कोई सर्वशक्तिमान और करुणामय ईश्वर होता, तो वह इस तरह के अत्याचारों को मूक दर्शक बनकर नहीं देखता। इसी क्रम में उनका वह व्यंग्यात्मक कथन भी आया, जो वायरल हुआ कि खुदा से बेहतर तो हमारे प्रधानमंत्री हैं, कम से कम दिखाई तो देते हैं और कुछ ख्याल तो रखते हैं। यह टिप्पणी केवल तंज नहीं थी, बल्कि उस निराशा की अभिव्यक्ति थी जो अदृश्य ईश्वरीय सत्ता की अवधारणा से उपजती है।
 
दूसरी ओर, मुफ्ती शमाइल नदवी का पक्ष भौतिक विज्ञान की सीमाओं से आगे जाकर दार्शनिक और आध्यात्मिक धरातल पर खड़ा था। उनका कहना था कि विज्ञान यह तो बता सकता है कि ब्रह्मांड कैसे काम करता है, लेकिन यह नहीं बता सकता कि वह क्यों अस्तित्व में है। ‘क्यों’ का सवाल विज्ञान के दायरे से बाहर और दर्शन के क्षेत्र में आता है। 
 
उन्होंने सृष्टि-तर्क(Creation या Contingency Argument) का सहारा लेते हुए कहा कि इस दुनिया की हर चीज़ किसी न किसी कारण पर निर्भर है। अगर एक छोटी-सी सुई भी खुद-ब-खुद नहीं बन सकती, तो इतना विशाल, जटिल और सुव्यवस्थित ब्रह्मांड अपने आप कैसे अस्तित्व में आ सकता है? इसके पीछे किसी ऐसे ‘ज़रूरी अस्तित्व’ का होना आवश्यक है, जो स्वयं किसी पर निर्भर न हो और वही ईश्वर है। मुफ्ती साहब ने यह भी स्पष्ट किया कि ईश्वर को भौतिक आँखों से या प्रयोगशाला में परखने की अपेक्षा ही गलत है, क्योंकि ईश्वर भौतिक नियमों से परे की सत्ता है।
 
नैतिकता के प्रश्न पर भी दोनों दृष्टिकोण टकराते दिखाई दिए। जावेद अख्तर के लिए नैतिकता मानवीय अनुभव, सहानुभूति और सामाजिक विकास की उपज है, जबकि मुफ्ती शमाइल नदवी के अनुसार प्रकृति स्वयं नैतिक नहीं होती, शेर का हिरण को खाना न अच्छा है न बुरा, वह केवल प्राकृतिक है। लेकिन मनुष्य के भीतर सही-गलत का बोध, न्याय और करुणा की भावना ईश्वर-दत्त है। अत्याचार और पाप ईश्वर की नहीं, बल्कि मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा और उसके गलत चुनावों की परिणति हैं।
 
इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि यहाँ कोई एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं थी। असहमति थी, तीखे सवाल थे, लेकिन अपमान नहीं था।न कोई चिल्लाया, न किसी ने दूसरे की बात काटकर अपनी आवाज़ ऊँची की। शायद यही कारण है कि यह बहस सोशल मीडिया और बौद्धिक हलकों में इतनी चर्चा में रही। यह बहस इस बात का प्रमाण बनी कि विचारों की टकराहट भी गरिमा और सम्मान के साथ हो सकती है, और असहमति भी संवाद का सुंदर रूप ले सकती है।
 
अंततः इस बहस से कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला ना ईश्वर के अस्तित्व पर अंतिम मुहर लगी, न उसके पूर्ण निषेध की घोषणा हुई। लेकिन शायद इसका उद्देश्य भी यही नहीं था। इसका उद्देश्य था सोचने की जगह बनाना, सवालों को ईमानदारी से रखने और सुनने का अवसर देना। 
 
टीवी स्टूडियो की शोर-शराबे वाली बहसों से ऊबे दर्शकों के लिए यह एक ताज़ी हवा का झोंका थी। यह याद दिलाने वाली बहस थी कि लोकतंत्र और सभ्यता की असली ताकत ऊँची आवाज़ में नहीं, बल्कि गहरे विचार और शांत संवाद में होती है।
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