घुघुति त्यार और कौवे की पुकार : कुमाऊँ का लोकबोध

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कमल किशोर पाण्डे 
(उप सम्पादक) “खबर सच है” 
 
 
कुमाऊँ की पर्व-परंपराएँ केवल तिथि-आधारित उत्सव नहीं हैं, वे प्रकृति, ऋतु और जीवन के साथ मनुष्य के संवाद की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। मकर संक्रांति, जिसे कुमाऊँ अंचल में उत्तरायणी या घुघुति त्यार कहा जाता है, इसी संवाद का सबसे कोमल और अर्थपूर्ण उदाहरण है।
 
उत्तरायणी का दिन आते ही धूप में थोड़ी गर्माहट उतर आती है। घरों के आँगन में फिर से रौनक दिखने लगती है। बुज़ुर्ग कहते हैं— “अब दिन बढ़ेंगे तो मन भी बढ़ेगा।”
 
घुघुति त्यार की सबसे खास बात है घुघुति। आटा, गुड़ और घी बस ये तीन चीज़ें, पर स्वाद में पूरी संस्कृति घुली होती है।इनसे तरह-तरह की आकृतियाँ बनती हैं जैसे डमरू, ढाल, तलवार, अनार आदि और फिर धागे में पिरोकर बच्चों के गले में डाल दी जाती हैं।
 
📍कुमाऊँ में कहावत है— “बचपन में जो डाला, वही जीवन भर निभाया।” घुघुति माला में भी वही संस्कार हैं जो बचपन में गले में डाले जाते हैं और उम्र भर साथ चलते हैं।
 
सुबह होते ही बच्चे छतों पर चढ़ जाते हैं और आवाज़ लगाते हैं— 
“काले कौआ काले, 
घुघुित माला खाले।
ले कौआ बड़, 
मकें दिजा सुनक घड़।
ले कौआ डमरू, 
मकें दिजा सुनक घुॅघरू।”
 
❗अब कोई पूछे—कौवा ही क्यों?
तो पहाड़ का जवाब सीधा है—हमारी लोकमान्यता में कौवा केवल पक्षी नहीं है। वह पितरों का प्रतीक, खेतों का साथी और ऋतु परिवर्तन का पहला संदेशवाहक है। इसीलिए यहाँ कहा जाता है—
“पहले कौवे का, फिर अपना।”
 
आज के समय में जहाँ त्योहार मतलब पहले थाली, पहले फोटो और पहले स्टेटस हो गया है, घुघुति त्यार हमें सिखाता है कि “देना पहले, लेना बाद में।”
 
📍कुमाऊँ में उत्तरायणी केवल एक तिथि नहीं, एक संस्कार है जिसमें बच्चे लोकगीत सीखते हैं, पक्षी भरोसा पाते हैं और संस्कृति बिना शोर के अगली पीढ़ी तक पहुँच जाती है।
 
उत्तरायणी का यह स्वरूप आधुनिक उपभोगवादी त्योहारों से भिन्न है। यहाँ न शोर है, न प्रदर्शन बस लोकगीत, ठंडी धूप और आँगन में उतरती संस्कृति। 
 
आज जब त्योहारों से लोकगीत ग़ायब होते जा रहे हैं और परंपराएँ केवल कैलेंडर तक सिमट रही हैं, घुघुति त्यार हमें बड़े सलीके से सिखाता है कि—
• प्रकृति से रिश्ता शोर से नहीं, स्नेह से निभता है।
• बच्चे किताब से नहीं, लोकगीत से सीखते हैं।
• और संस्कृति भाषणों से नहीं, रोज़मर्रा की आदतों से बचती है।
 
⭐ और सच कहा जाए तो जब तक कुमाऊँ में बच्चे छतों से “काले कौवा” पुकारते रहेंगे, तब तक यह पहाड़ अपनी आत्मा नहीं खोएगा।
                              .. .𓂃✍︎
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TAGS: Ghughuti festival and the call of the crow: Folk traditions of Kumaon

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