शिकागो से आज तक: विवेकानंद और हमारा वर्तमान

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कमल किशोर पाण्डे
(उप सम्पादक)
“खबर सच है” 
 
स्वामी विवेकानंद द्वारा 11 सितंबर 1893 को विश्व धर्म संसद, शिकागो में दिया गया यह भाषण भारत की आध्यात्मिक चेतना, सहिष्णुता और वैश्विक मानवता का ऐतिहासिक उद्घोष था। यह केवल एक भाषण नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का विश्वमंच पर आत्मविश्वासपूर्ण परिचय था। 
 
प्रस्तुत है ऐतिहासिक भाषण के मुख्य बिंदु—
 
“अमेरिका के भाइयों और बहनों,”
(इन शब्दों पर सभागार में कई मिनट तक तालियाँ बजती रहीं)
 
मुझे अत्यंत गर्व है कि मैं उस धर्म का प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकार्यता दोनों सिखाई है।
 
मुझे गर्व है कि मैं उस राष्ट्र से हूँ जिसने हर धर्म और हर देश के शरणार्थियों को अपने हृदय में स्थान दिया है।
 
मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने उन यहूदियों को शरण दी जिन्हें उनके पवित्र मंदिर के विनाश के बाद रोमन अत्याचार से भागना पड़ा था, और जो आज भी हमारे बीच सुरक्षित हैं।
 
मुझे उस महान धर्म पर गर्व है जिसने पारसी समुदाय को शरण दी और आज तक उन्हें सुरक्षित रखा है।
 
मैं उस धर्म से संबंधित हूँ जिसने दुनिया को यह सिखाया— “जैसे विभिन्न नदियाँ अलग-अलग मार्गों से बहकर अंततः समुद्र में मिल जाती हैं, वैसे ही मनुष्य द्वारा चुने गए अलग-अलग मार्ग अंततः ईश्वर तक ही पहुँचते हैं।”
 
यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि केवल उसका ही धर्म सत्य है और अन्य सभी धर्म झूठे हैं, तो वह न केवल अज्ञान है बल्कि खतरनाक भी है।
 
धार्मिक कट्टरता, संकीर्णता और हठधर्मिता ने इस सुंदर धरती को बहुत लंबे समय तक हिंसा और रक्तपात से भर दिया है। 
 
इन्होंने सभ्यताओं को नष्ट किया है, राष्ट्रों को तबाह किया है, और मनुष्यों को एक-दूसरे का दुश्मन बनाया है। यदि ये न होतीं, तो मानव समाज आज कहीं अधिक उन्नत होता।
 
लेकिन मुझे आशा है कि यह सभा, जो इन सबका अंत करने के लिए संगठित हुई है, घोषणा करेगी कि अब और नहीं। अब समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि हर धर्म में सत्य का अंश है, और हर मार्ग ईश्वर की ओर ही जाता है।
 
मैं केवल सहिष्णुता में विश्वास नहीं करता, मैं सभी धर्मों की सत्यता में विश्वास करता हूँ।
 
मैं उस धर्म से हूँ जो कहता है— “जिस प्रकार एक दीपक अनेक दीपकों को जला सकता है और फिर भी अपनी ज्योति नहीं खोता, उसी प्रकार सत्य साझा करने से सत्य कम नहीं होता।”
 
संकीर्ण विचारों का समय समाप्त होना चाहिए। यह वही संकीर्णता है जिसने मनुष्य को मनुष्य से अलग किया।
 
मैं आशा करता हूँ कि इस धर्म संसद से एक ऐसा संदेश जाएगा जो पूरी मानवता को जोड़ने वाला होगा।
 
कट्टरता, संकीर्णता और हठधर्मिता के अंत की कामना के साथ।
 
(उन्होंने संदेश पूरा किया, कुछ क्षण का मौन रहा और फिर सभागार लंबे, स्वतःस्फूर्त तालियों और खड़े होकर सम्मान से गूँज उठा)
 
•• ••
 
1893 में शिकागो में स्वामी विवेकानंद ने जो कहा, वह केवल धार्मिक वक्तव्य नहीं था, बल्कि समाज, राज्य और सत्ता के लिए एक नैतिक दिशा थी।
 
जब उन्होंने सभी धर्मों की सत्यता की बात की, तो उसका आशय था— विचारों का सह-अस्तित्व, न कि वर्चस्व।
 
आज के भारत और विश्व में समस्या धर्म की नहीं, धर्म के राजनीतिक उपयोग की है। जहाँ विवेकानंद का धर्म मानव को जोड़ता था, आज वही पहचान अक्सर विभाजन का औज़ार बन जाती है।
 
असहमति को राष्ट्रविरोध और सवाल को अपराध मानने की प्रवृत्ति, विवेकानंद की चेतावनी को और प्रासंगिक बना देती है।
 
विवेकानंद का भारत नैतिक साहस वाला लोकतंत्र चाहता था जहाँ सत्ता विवेक से चले, डर से नहीं; जहाँ राष्ट्रवाद मानवता के विरुद्ध न खड़ा हो।
 
शिकागो का भाषण आज एक आईना है जिसमें हम देख सकते हैं कि हम सहिष्णुता, विवेक और आत्मबल के रास्ते पर हैं या संकीर्णता और भय के।
 
विवेकानंद का संदेश आज भी उतना ही स्पष्ट है— विचारों से डरने वाला समाज कभी महान नहीं बनता।
                                 .. .𓂃✍︎

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