✍️मनोज कुमार पाण्डे
1 सितंबर 1994… उत्तराखण्ड के इतिहास का वह दिन, जिसे याद करते ही आंखों के सामने आंदोलन, संघर्ष, गोलियों की आवाज और अपने पहाड़ के लिए सब कुछ न्योछावर कर देने वाले आंदोलनकारियों की तस्वीर उभर आती है। खटीमा गोलीकांड से लेकर मसूरी और मुजफ्फरनगर तक राज्य आंदोलन की राह खून और बलिदान से होकर गुजरी। यह केवल एक अलग राज्य की मांग नहीं थी, बल्कि पहाड़ के अस्तित्व, सम्मान, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और अपनी पहचान के लिए लड़ी गई लड़ाई थी। आज उस आंदोलन को 32 वर्ष हो चुके हैं।
9 नवंबर 2000 को उत्तराखण्ड अलग राज्य बना। वह दिन आंदोलनकारियों और पूरे पहाड़ के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि थी। उत्तराखण्ड को देश का 27वां राज्य बनाया गया। लेकिन 32 साल बाद एक सवाल आज भी उतनी ही मजबूती से हमारे सामने खड़ा है—
क्या हमने वास्तव में उस उत्तराखण्ड का निर्माण किया है, जिसकी कल्पना आंदोलनकारियों और शहीदों ने की थी?
शायद इसका जवाब पूरी तरह ‘हां’ में देना मुश्किल होगा।
राज्य मिला, लेकिन क्या पहाड़ को उसका हक मिला?
अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड ने निश्चित रूप से विकास की कई सीढ़ियां चढ़ीं। सड़कें बनीं, शिक्षण संस्थान बढ़े, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ, पर्यटन ने गति पकड़ी, चारधाम यात्रा ने नई पहचान बनाई और राज्य ने देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान कायम की।
लेकिन विकास का सबसे बड़ा पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि राजधानी और बड़े शहर कितने विकसित हुए।
सवाल यह होना चाहिए कि दूरस्थ गांवों में रहने वाले पहाड़ी व्यक्ति का जीवन कितना बदला?
क्या गांव में रोजगार मिला?
क्या बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उसके घर के करीब पहुंची?
क्या बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए गांव छोड़ने की मजबूरी कम हुई?
क्या खेतों में फिर से हरियाली लौटी?
क्या खाली होते गांव आबाद हुए?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या पलायन रुका?
अगर इन सवालों के जवाब खोजे जाएं तो तस्वीर अभी भी अधूरी दिखाई देती है।
पलायन—शहीदों के सपनों पर सबसे बड़ा सवाल
जिस पहाड़ के लिए लोगों ने अलग राज्य की लड़ाई लड़ी, उसी पहाड़ के हजारों गांव आज भी पलायन की पीड़ा झेल रहे हैं।
कभी जिन गांवों में सुबह चूल्हे जलते थे, खेतों में हल चलता था और चौपालों पर जीवन की आवाज सुनाई देती थी, वहां आज सन्नाटा दिखाई देता है।
अगर पहाड़ का युवा रोजगार के लिए देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली, नोएडा, चंडीगढ़ और मुंबई की ओर जाने को मजबूर है, तो हमें खुद से पूछना होगा कि आखिर अलग राज्य बनने का मूल उद्देश्य कितना पूरा हुआ?
राज्य का निर्माण केवल नई सरकारी इमारतें खड़ी करने से नहीं होता। राज्य तब बनता है, जब उसका आम नागरिक अपने घर और अपनी मिट्टी में सम्मान के साथ जीवन जी सके।
प्राकृतिक संपदा हमारी ताकत थी, विकास के नाम पर चुनौती क्यों बन गई?
उत्तराखण्ड हिमालय, जंगलों, नदियों और जैव विविधता की दृष्टि से असाधारण राज्य है। स्वयं राज्य सरकार भी उत्तराखण्ड को प्राकृतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र मानती है।
लेकिन आज सवाल यह है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कहां है?
बेतरतीब निर्माण, बढ़ता यातायात, अनियोजित पर्यटन, कूड़ा प्रबंधन की चुनौतियां, भूस्खलन और लगातार बढ़ता पर्यावरणीय दबाव हमें चेतावनी दे रहे हैं।
जिस पहाड़ की प्रकृति ने उत्तराखण्ड को पहचान दी, उसी प्रकृति के साथ अगर हमने खिलवाड़ किया तो आने वाली पीढ़ियां हमसे सवाल करेंगी।
क्या शहीदों ने ऐसा उत्तराखण्ड मांगा था, जहां पहाड़ की कीमत पर विकास हो?
राजधानी का सवाल भी अधूरा है
राज्य आंदोलन के दौरान गैरसैंण को लेकर जो भावनाएं थीं, वे आज भी उत्तराखण्ड की राजनीतिक और सामाजिक चेतना में मौजूद हैं।
राज्य की वर्तमान सरकारी जानकारी के अनुसार देहरादून अस्थायी राजधानी और गैरसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी है।
लेकिन राजधानी का सवाल केवल भवन और प्रशासनिक व्यवस्था का सवाल नहीं है।
यह उस सोच का सवाल है कि क्या सत्ता वास्तव में पहाड़ के करीब पहुंची?
अगर निर्णय लेने वाली व्यवस्था पहाड़ की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं होगी, तो अलग राज्य का मूल उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।
आंदोलनकारियों का सम्मान केवल समारोहों तक सीमित न हो
आज हर साल शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।
माल्यार्पण होता है।
भाषण होते हैं।
शहीदों के नाम लिए जाते हैं।
लेकिन क्या इतना पर्याप्त है?
शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी जब उत्तराखण्ड का नौजवान अपने गांव में रोजगार पा सकेगा।
जब पहाड़ की बेटी को पढ़ाई और नौकरी के लिए पलायन करना मजबूरी नहीं, विकल्प होगा।
जब बुजुर्ग माता-पिता अपने बच्चों की राह देखते हुए अकेले नहीं रहेंगे।
जब पहाड़ के किसान को अपनी जमीन छोड़ने के बजाय खेती में भविष्य दिखाई देगा।
जब दूरस्थ गांव में रहने वाले व्यक्ति को भी वही स्वास्थ्य और शिक्षा मिलेगी जो मैदानी शहर में रहने वाले व्यक्ति को मिलती है।
32 साल बाद हमें उत्सव से ज्यादा आत्ममंथन की जरूरत है
आज हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि उत्तराखण्ड ने 32 वर्षों में कितना विकास किया।
हमें यह पूछना चाहिए—
हमने क्या खोया और क्या पाया?
कितने गांव बचे और कितने खाली हुए?
कितने युवाओं को रोजगार मिला और कितने रोजगार की तलाश में बाहर चले गए?
कितनी नदियां और जंगल सुरक्षित रहे?
क्या हमारी राजनीति ने पहाड़ की वास्तविक समस्याओं को प्राथमिकता दी?
क्या आम आदमी की सरकार तक पहुंच आसान हुई?
और सबसे बड़ा सवाल—
अगर आज खटीमा, मसूरी और मुजफ्फरनगर के शहीद हमारे बीच होते, तो क्या वे आज के उत्तराखण्ड को देखकर संतुष्ट होते?
इस सवाल का जवाब शायद हमारे पास नहीं है।
लेकिन यह सवाल हमें जरूर बेचैन करता है।
क्योंकि उत्तराखण्ड केवल 53 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल वाला एक राज्य नहीं है। यह उन लाखों लोगों की भावनाओं का परिणाम है, जिन्होंने अपनी पहचान और आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष किया। राज्य की आधिकारिक जानकारी के अनुसार इसका क्षेत्रफल लगभग 53,483 वर्ग किलोमीटर है।
शहीदों की कल्पना का उत्तराखण्ड अभी बनना बाकी है
सच यह है कि उत्तराखण्ड ने उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन मंजिल अभी बाकी है।
हमें ऐसा उत्तराखण्ड चाहिए—
जहां पहाड़ से पलायन मजबूरी न हो।
जहां गांवों में रोजगार हो।
जहां खेत बंजर न हों।
जहां शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए लोगों को मैदानों की ओर न भागना पड़े।
जहां पर्यटन प्रकृति का सम्मान करते हुए रोजगार का साधन बने।
जहां विकास पहाड़ को काटकर नहीं, पहाड़ को बचाकर हो।
जहां राजनीति सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, जनसेवा का संकल्प हो।
और जहां राज्य आंदोलन के शहीद केवल सरकारी कार्यक्रमों में तस्वीरों पर माला पहनाए जाने वाले नाम न हों, बल्कि राज्य की नीतियों और विकास की दिशा के मार्गदर्शक हों।
32 साल बाद उत्तराखण्ड को एक बार फिर अपने आंदोलन की मूल भावना की ओर लौटना होगा।
राज्य तो मिल गया, अब उस राज्य को शहीदों के सपनों का राज्य बनाना बाकी है।
शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम हर वर्ष उनकी बरसी पर केवल दो मिनट का मौन न रखें, बल्कि दो मिनट के लिए यह भी सोचें कि—
“जिस उत्तराखण्ड के लिए उन्होंने अपना जीवन दिया, क्या हम उस उत्तराखण्ड को बनाने की दिशा में ईमानदारी से आगे बढ़ रहे हैं?”
अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो अभी देर नहीं हुई।
क्योंकि उत्तराखण्ड का सपना अभी खत्म नहीं हुआ है…
वह हर उस पहाड़ी के भीतर जिंदा है, जो अपने गांव, अपनी मिट्टी और अपनी पहचान के साथ सम्मानपूर्वक जीना चाहता है।
शहीदों को शत-शत नमन।