मनोज कुमार पाण्डे ✍️
हल्द्वानी का रामलीला मैदान इन दिनों राजनीतिक टकराव का प्रतीक बन गया है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद तथाकथित भाजपा समर्थित हिन्दू नेताओं द्वारा सभा स्थल के शुद्धिकरण का मामला सामने आया। इसके बाद आरोप-प्रत्यारोप, प्रशासनिक कार्रवाई, धरना-प्रदर्शन, गिरफ्तारी की मांग और पुतला दहन तक राजनीति पहुंच गई।
सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में राजनीतिक असहमति का स्तर इतना नीचे आ जाना चाहिए कि विचारों का जवाब विचारों से देने के बजाय स्थान का शुद्धिकरण और एक-दूसरे के पुतले जलाना ही राजनीति का माध्यम बन जाए?
राजनीतिक दलों की विचारधारा अलग हो सकती है, नीतियों को लेकर मतभेद हो सकते हैं और सत्ता-विपक्ष के बीच तीखी बहस भी लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि असहमति के बावजूद संवाद और संवैधानिक मर्यादा बनी रहे। आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल अपने राजनीतिक विरोध और सामाजिक वैमनस्य के बीच की महीन रेखा को समझें।किसी नेता के विचारों का विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन विरोध ऐसा न हो जो समाज को धार्मिक, जातीय या राजनीतिक खांचों में और गहरा बांट दे।
कभी राजनीति में व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर राष्ट्रहित को रखने की परंपरा का उदाहरण दिया जाता था। संसद में तीखी बहस होती थी, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं और सार्वजनिक मर्यादाओं के प्रति सम्मान भी दिखाई देता था। आज परिस्थितियां बदल रही हैं। सोशल मीडिया और कैमरे के दौर में हर राजनीतिक गतिविधि को ‘दृश्य’ बनाने की होड़ है—धरना हो, नारे हों, पुतला हो या कोई प्रतीकात्मक कार्रवाई।
राजनीति का उद्देश्य समाज को जोड़ना है या फिर समाज को लगातार नए विवादों में बांटना?
हल्द्वानी का यह घटनाक्रम केवल कांग्रेस और भाजपा के बीच का विवाद नहीं माना जाना चाहिए। यह राजनीतिक संस्कृति के सामने खड़ा एक बड़ा प्रश्न है। सत्ता किसी भी दल की हो और विपक्ष किसी भी दल का—लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नीतियों, विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनहित के मुद्दों पर होगी।
जनता को यह तय करना है कि उसे नेताओं की आपसी लड़ाई चाहिए या अपने शहर और प्रदेश के भविष्य पर सार्थक बहस।
राजनीतिक दलों को भी तय करना होगा कि वे इतिहास से क्या सीख लेना चाहते हैं—विरोध की राजनीति या विचारों की राजनीति।
क्योंकि अंततः पुतला जलने के बाद राख बचती है, लेकिन स्वस्थ लोकतांत्रिक बहस से भविष्य की दिशा निकलती है।
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