चीन को दुश्मन बताने का शोर जितना ऊँचा हुआ, चीन पर निर्भरता उतनी ही गहरी होती चली गई। यह विरोधाभास नहीं, यह खुला दोगलापन है।
सीमा पर टकराव, शहादत और राष्ट्रवाद की आड़ में जनता को भावनात्मक रूप से लामबंद किया गया, जबकि बंदरगाहों पर चीनी माल पहले से ज़्यादा मात्रा में उतरता रहा। सरकार ने जो कहा, उसने वही नहीं किया और जो किया, उसे छुपाया गया।
सरकार ने गलवान के बाद कहा था कि भारत चीन को आर्थिक मोर्चे पर सबक सिखाएगा। सवाल यह है कि सबक किसे मिला। जहां चीन को भारत का बाज़ार और बड़ा मिलता गया वहीं भारतीय उद्योग और कमज़ोर होता चला गया। यह नाकामी नहीं तो क्या है।
आत्मनिर्भर भारत का नारा उत्पादन की नीति नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक परदा था। ना तो फैक्ट्रियाँ खड़ी हुईं, ना टेक्नोलॉजी आई, ना एमएसएमई को वह सुरक्षा मिली जिसके बिना पर कोई अर्थव्यवस्था खड़ी नहीं हो सकती। पाँच साल में चीन को भारत का निर्यात लगातार गिरता गया और चीन से आयात लगभग दोगुना हो गया। यही है सरकार का तथाकथित “आर्थिक जवाब”।
टीवी स्टूडियो में चीनी बहिष्कार का नाटक और वास्तविक अर्थव्यवस्था में चीनी मशीनों, केमिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स पर आत्मसमर्पण। यह राष्ट्रवाद नहीं, नकली देशभक्ति की अर्थव्यवस्था है।
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