खबर सच है संवाददाता
कामां। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्री हरि कृपा आश्रम, कामां, जिला डीग (राजस्थान) में आयोजित दो दिवसीय विराट गुरु पर्व सम्मेलन का दूसरा दिन आध्यात्मिक आस्था, भक्ति और राष्ट्रभक्ति के अद्भुत संगम का साक्षी बना।
प्रातःकाल अखंड रामचरितमानस पाठ का विधिवत पूर्णाहुति के साथ समापन हुआ। इसके उपरांत भक्ति संगीत एवं भजन संध्या में कलाकारों ने अपनी मधुर प्रस्तुतियों से पूरे आश्रम परिसर को हरि भक्ति के रस में सराबोर कर दिया। श्रद्धालु भजनों पर झूमते हुए गुरु भक्ति में लीन दिखाई दिए।
कार्यक्रम के दौरान भारत के वीर शहीदों के परिजनों का सम्मान कर उनके अद्वितीय त्याग और बलिदान को नमन किया गया। इसके पश्चात श्री हरि कृपा पीठाधीश्वर स्वामी श्री हरि चैतन्य महाप्रभु जी के दिव्य एवं प्रेरणादायी प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को धर्म, मानवता और राष्ट्रसेवा का संदेश दिया। तत्पश्चात हजारों श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और भक्ति भाव से गुरु पूजन किया तथा विशाल भंडारे में प्रसाद ग्रहण कर पुण्य लाभ अर्जित किया।
विराट गुरु पूजन पर्व के दूसरे दिन मुख्य अतिथि के रूप में पधारे शाहनवाज़ हुसैन ने महाराज श्री के सान्निध्य में श्री हरि कृपा आश्रम की वाटिका में वटवृक्ष का पौधा रोपित कर पर्यावरण संरक्षण, हरियाली और राष्ट्र की समृद्धि का संदेश दिया।
गुरु पर्व के मंच से अपने संबोधन में पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज़ हुसैन ने कहा कि महाराज श्री के लिए सभी धर्म समान हैं। वे सदैव अपने अनुयायियों को ‘सर्वधर्म समभाव’ का संदेश देते हैं और समाज में प्रेम, सौहार्द, सद्भाव तथा राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे संत समाज को जोड़ने और राष्ट्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अपने ओजस्वी प्रवचनो में महाराज श्री ने उपस्थित जन समुदाय को सम्बोधित करते हुए कहा, गुरु केवल एक व्यक्ति नहीं, अपितु परमात्मा की करुणा का साकार स्वरूप हैं। सद्गुरु वही हैं जो जीव को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के दिव्य प्रकाश की ओर ले जाएँ, उसके जीवन को धर्म, सत्य, सेवा और साधना के मार्ग पर अग्रसर करें तथा कर्मक्षेत्र में उसे सफलता के साथ-साथ आत्मकल्याण का मार्ग भी दिखाएँ।
भारतीय सनातन संस्कृति में गुरु का स्थान स्वयं भगवान से भी पहले माना गया है। यही कारण है कि स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने महर्षि वशिष्ठ और महर्षि विश्वामित्र की शरण ग्रहण की, उनकी सेवा की और उनकी आज्ञाओं का पालन किया। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने भी महर्षि सांदीपनि के आश्रम में रहकर गुरु-सेवा की तथा गुरु-दक्षिणा देकर संसार के समक्ष गुरु-भक्ति का सर्वोच्च आदर्श स्थापित किया।
जब स्वयं ईश्वर मानव रूप में अवतार लेकर गुरु की महिमा का गुणगान करते हैं, उनके चरणों में श्रद्धा अर्पित करते हैं और गुरु-आज्ञा को अपना धर्म मानते हैं, तब साधारण मनुष्य कैसे गुरु की महिमा को सीमित कर सकता है? गुरु की महिमा शब्दों से परे है, क्योंकि गुरु ही वह दिव्य शक्ति हैं जो जीव को संसार के बंधनों से मुक्त कर परम सत्य का बोध कराती है।
शास्त्रों में कहा गया है— “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥” अर्थात गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही महेश्वर हैं और गुरु ही साक्षात् परब्रह्म स्वरूप हैं। इसलिए गुरु की महिमा का आकलन बुद्धि से नहीं, श्रद्धा से होता है। जिस हृदय में गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा, समर्पण और विश्वास जागृत हो जाता है, वहाँ ईश्वर की कृपा स्वतः प्रकट होने लगती है। गुरु के चरणों में समर्पित जीवन ही वास्तव में सफल, सार्थक और धन्य जीवन है।
इस दो दिवसीय विराट गुरु पूजन पर्व में देश भर से लाखों की संख्या में हरि भक्तों के साथ ही केंद्रीय मंत्री, राज्य मंत्री, विधायक, अधिकारी एवं वीवीआईपी श्री हरि कृपा आश्रम कामां पधारें।
श्री हरि कृपा पिठाधिश्वर स्वामी श्री हरि चैतन्य महाप्रभु जी के सानिध्यमें में ज़ब -ज़ब धार्मिक आयोजन हुए वहां सभी जगह राष्ट्र सम्मान, वीरों के गौरव का मान और हरि भक्तों के हाथो तिरंगा भी दिखाई देता है। जिससे स्पष्ट है कि महाराज श्री के लिए राष्ट्र धर्म प्रथम है।
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