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श्री हरेश्वर महादेव व श्री दिव्येश्वर महादेव की सजाई गई दिव्य झांकी
रामनगर। श्री हरि कृपा आश्रम चित्रकूट रामनगर में स्थित श्री दिव्येश्वर महादेव व श्री हरि कृपा धाम आश्रम गढीनेगी में स्थित श्री हरेश्वर महादेव की आज भव्य व दिव्य झांकी सजाई गई । आश्रम के संस्थापक एंव श्री हरि कृपा पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 स्वामी श्री हरि चैतन्य पुरी जी महाराज के पावन सानिध्य में श्री दिव्येश्वर महादेव व प्रातः श्री हरेश्वर महादेव का वेदोक्त रीति से गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद व शक्कर से महाभिषेक किया गया । रूद्राष्टक व सुन्दर काण्ड का सस्वर पाठ श्री महाराज जी के साथ साथ बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने किया । सावन के दूसरे सोमवार को आज गढीनेगी में श्री हरेश्वर महादेव व रामनगर में श्री दिव्येश्वर महादेव के दर्शनों के लिए लगातार श्रद्धालुओं का ताँता लगा रह। सुन्दरकाण्ड पाठ, भजन-कीर्तन व महाआरती का भी आयोजन किया गया ।
महाराज जी ने उपस्थित भक्तसमुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि थोड़ी सी विषमता होने पर घर, परिवार व समाज में अशांति पैदा हो जाती है, लेकिन भगवान शंकर तो इतनी विविधताओं, विषमताओं यहाँ तक कि एक दूसरे के स्वभाविक शत्रुओं को समेट कर बैठे हैं।इन विविधताओं व विषमताओं के बावजूद उनके परिवार में आपसी प्रेम और सदभाव बरक़रार रहता है।
उन्होंने कहा कि इतनी सामर्थ्य व शक्ति होते हुए भी उसका दुरपयोग नहीं करते अपने मस्तिष्क को ठंडा रखते हैं।भगवान शंकर सिर पर गंगा व चंद्रमा धारण किये हुए हैं जो शीतलता के प्रतीक हैं। शिव राम का नाम जपते हैं राम शिव का नाम जपते हैं। कितनी महानता लेकिन फिर भी निरभिमानता। दूसरों को सम्मान देना यह सब भी तो सीखो, तभी तो बनेंगे शिव के सच्चे भक्त। उन्होंने कहा कि राम का भक्त यदि माँ बाप का निरादर करें, उनकी आज्ञापालन न करें, संत, गुरु व ब्राह्मण का निरादर करे। भाई भाई से लड़े, कर्तव्य व मर्यादा का पालन न करें, मात्र अधिकार के लिए ही लड़ता रहे, अधर्म का साथ दे, लोगों से घृणा करें, अभिमान में ही अकड़ा फिरे तो कैसा राम भक्त है ? विचार करें। हम सभी अपने महापुरुषों, तीर्थों, शास्त्रों व परमात्मा के विभिन्न अवतारों से प्राप्त होने वाले शिक्षाओं, प्रेरणाओं, उपदेशों को मात्र अपनी कमियों को छुपाने के लिए ढाल ही न बनायें बल्कि अपने जीवन में उतारकर कल्याणमय मार्ग पर आगे बढ़ें। और मानव जीवन की सार्थकता मात्र पशु तुल्य अपने तक ही सीमित रहने में नहीं अपितु किसी के काम आने में है। ईश्वर कृपा से प्राप्त धन, बल, पद, सामर्थ्य आदि का भोग या उपयोग ही नहीं बल्कि सदुपयोग करना चाहिए। पाँच कर्म इन्द्रियां व पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ इन दसों इंद्रियों को चाहे सांसारिक कर्तव्यों के पालन में लगाएं लेकिन एक मन को जो कि परमात्मा की ही अमानत है उसे उसके सिमरन भजन में लगाना चाहिए। संग का भी जीवन में सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। संग अच्छा करना चाहिए, भोजन भी सात्विक, संयमित, संतुलित ही ग्रहण करना चाहिए।
अपने दिव्य प्रवचनों में उन्होंने कहा कि संत रूपी बादलों द्वारा जो सत्संग रुपी वर्षा होती है उसमें अपने मन की कलुषता व विकारों को धोकर मन को पावन बनाना है। जैसे बादलों को देखकर मोर व पपीहा मगन हो नृत्य करने लगते हैं, तथा पीहू पीहू की धुनि लगाने लगते हैं।ऐसे ही संत व भक्तों को देखकर हमारा मन मयूर भी यदि नाचने न लग जाए, सत्संग की वर्षा में हम मन को पावन न करें तथा अपने पिया (परमात्मा) को याद न करने लगे तो इसे दुर्भाग्य ही समझना चाहिए। जगत की यथासंभव व यथासामर्थ्य सेवा एवं परमात्मा से प्रेम करना चाहिए।
महाराज जी के दिव्य व ओजस्वी प्रवचनों से सारा वातावरण भक्तिमय हो उठा। तथा सभी मंत्र मुग्ध हो गये व “हरि बोल” व हर हर महादेव की धुन में झूम उठे।
इससे पूर्व कल श्री हरि कृपा धाम आश्रम गढीनेगी व आज श्री हरि कृपा आश्रम रामनगर पधारने पर बड़ी संख्या में भक्तों ने महाराज जी का फूल मालायें पहनाकर, आरती उतारकर, पुष्प वृष्टि करते हुए श्री गुरु महाराज, कामां के कन्हैया व लाठी वाले भैय्या के जयकारों से भव्य व अभूतपूर्व स्वागत किया ।