एक बार फिर संवैधानिक संकट की ओर उत्तराखंड – प्रीतम

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देहरादून। वैसे तो यह पूरा मामला चुनाव आयोग का है, लेकिन लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत राज्य में वर्तमान परिस्थितियों में कोई चुनाव नहीं हो सकता है। सीएम रावत छह माह के भीतर विधानसभा का सदस्य बनने का अवसर गंवा चुके हैं। ऐसे में उत्तराखंड में एक बार फिर संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है। अपने आवास पर मीडिया से बातचीत के दौरान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने कहा कि वर्तमान में मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत विधायक नहीं हैं। उन्होंने कहा कि 9 सितंबर को छह माह पूरे हो रहे हैं। लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 151 ए के तहत, उस स्थिति में उप-चुनाव नहीं हो सकता है।

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प्रीतम का कहना है कि यदि चुनाव आयोग नियमों के हिसाब से चला तो चुनाव नहीं हो सकते, लेकिन यदि केंद्र या राज्य सरकार की कठपुतली बना तो फिर कुछ भी हो सकता है। लेकिन जो भी हो चुनाव आयोग को संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार ही उप चुनाव पर निर्णय लेना चाहिए। इस संबंध में  निर्वाचन आयोग का पक्ष लेने के लिए मुख्य निर्वाचन अधिकारी सौजन्या से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका।

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हालांकि कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष प्रीतम सिंह पर पलटवार करते हुए उत्तराखंड सरकार के शासकीय प्रवक्ता व कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि कांग्रेस मुख्यमंत्री के उपचुनाव के बारे में चिंता न करे। संवैधानिक जनादेश को पूरा करते हुए मुख्यमंत्री चुनाव लड़ेंगे।

ज्ञात रहे कि त्रिवेंद्र सिह रावत को भाजपा नेतृत्व द्वारा हटाये जाने के बाद तीरथ सिंह रावत ने 10 मार्च 2021 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। शपथ लेते समय वह विधानसभा के सदस्य नही थे और संवैधानिक बाध्यता है कि किसी भी मंत्री को शपथ लेने के 6 महीने के भीतर उसे विधायिका का सदस्य होनेा चाहिये। चूंकि उत्तराखण्ड में केवल विधानसभा का ही प्रावधान है तो तीरथ सिंह रावत को शपथ लिये जाने के 6 महीने के भीतर विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होना चाहिये। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 151 (क) के तहत भी किसी खाली पड़ी विधानसभा का शेष कार्यकाल एक वर्ष से कम होने के कारण उपचुनाव नहीं हो सकता।

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