धर्म के उत्थान व अधर्म के विनाश के लिए यथासामर्थ्य, यथासंभव योगदान अवश्य दें – श्री हरि चैतन्य महाप्रभु 

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खबर सच है संवाददाता 
 
रामनगर। प्रेमावतार, युगदृष्टा, श्री हरि कृपा पीठाधीश्वर व विश्व विख्यात संत स्वामी श्री हरि चैतन्य पुरी जी महाराज के यहां श्री हरि कृपा आश्रम में पहुँचने पर हरि भक्तों ने हार्दिक भव्य स्वागत किया। 
 
महाराज श्री ने यहां उपस्थित विशाल भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म के उत्थान व अधर्म के विनाश के लिए यथा सामर्थ्य, यथासंभव योगदान अवश्य दें। शबरी, निषाद इत्यादि जैसे समाज में ठुकराए व उपेक्षित वर्ग को भी गले लगाएं तभी राम के सच्चे भक्त कहलाने के अधिकारी हो पाएंगे। सभी में परमात्मा के दर्शन करते हुए व्यवहार करो।जो समस्त संसार को प्रभुमय कहते हैं या देखते हैं तो वे विरोध किससे करते हैं। वैर- विरोध, घृणा, द्वेष, अशांति इत्यादि त्यागो। कर्म, भक्ति व ज्ञान का जीवन  में समन्वय स्थापित करो। हम सभी के अंदर सदैव से अच्छाई व बुराई, धर्म-अधर्म, उचित-अनुचित इत्यादि द्वंद चल रहा है। लेकिन यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम किसे जीताते हैं। मन की चंचलता को अभ्यास द्वारा रोककर एकाग्रचित्त होकर, बर्हिमुखता त्यागकर, अंर्तमुख होकर हम अपनी स्वयं की प्रभा को जागृत कर सकते हैं। अध्यात्म पथ पर अग्रसर हो सकते हैं। प्रभु भक्ति का यदि हृदय में निवास हो तो किंचित मात्र भी प्रत्यक्ष में तो क्या स्वप्न में भी हमें दुख व्यथित नहीं कर सकते। किसी सुखी को देखकर ईषर्या करना, व दुखी को देखकर प्रसन्न होना यह दुष्टता के लक्षण है। आज हर ओर आसुरी प्रवृत्तियों का बोलबाला है। धर्म के अनुष्ठान चाहे बहुत हो रहे हैं। परंतु धर्म के आचरण में इतनी वृद्धि नहीं हो रही है। मदिरापान, मांसाहार, दूसरों के अनिष्ट चिंतन व अनिष्ट दिल दुखाना, जीवो की हत्या करना, वेद शास्त्रों के प्रतिकूल चलना, तीर्थ, मंदिर, मस्जिद, चर्च इत्यादि की मर्यादाओं को समाप्त करने का प्रयास, माता-पिता व बुजुर्ग संत महापुरुषों का अनादर व तिरस्कार करना, देश व समाज को तोड़ने की घृणित साज़िशे करना अथवा किसी प्रकार से भी उनमें सहयोग देना इत्यादि ये सभी आसुरी प्रवृत्तियां है। हम सभी स्वयं को इनसे दूर रखें साथ ही औरों को बचने की प्रेरणा दें। 
 
अपने दिव्य प्रवचनों में उन्होंने कहा कि प्रेम, एकता व सद्भाव को बढ़ावा दें। धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं परंतु दुर्भाग्यवश आज धर्म के नाम पर लोग टूटते व बटते जा रहे हैं। संत, महापुरुष व परमात्मा सबके हैं व सभी उनके हैं। इन्हें मात्र किसी वर्ग, संप्रदाय, जाति इत्यादि तक सीमित करना गलत होगा।विभिन्न मतभेदों को त्यागकर परिवार, देश व समाज में मिलजुल कर रहे। हम सभी अपने अन्तर मे आ चुके असुरत्व को त्यागे। किंचित मात्र भी अपने अंदर ना आने दें। तथा देवत्व को अपनाएं। पावन भारत देश व इस देवभूमि की संस्कृति, पवित्रता व मर्यादा को नष्ट ना होने दें। देवता और राक्षसों का युद्ध सतयुग इत्यादि में ही नहीं सदैव से हर प्राणी मात्र के अन्तर में होता है, हो रहा है, व होता रहेगा।हमारे अंतर में चलने वाले देवत्व व असुरत्व के द्वंद में जीव किसे विजयी कराता है यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है। मात्र अपने अधिकारों के लिए ही जागरूक ना हो, अपने कर्तव्यों का भी पालन करें व सेवा करें। सद्गुरु के कहे अनुसार चलें। 
 
अपने धारा प्रवाह प्रवचनों में उन्होंने सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध को भावविभोर कर दिया। सारा वातावरण भक्तिमय हो उठा तथा “श्री गुरु महाराज” “कामा के कन्हैया” व “लाठी वाले भैया” की जय जय कार से गुंजायमान हो उठा।
 
यहां पहुँचने से पूर्व कुन्डेश्वरी में भी श्री महाराज जी का हरि भक्तों ने हार्दिक भव्य स्वागत किया, स्थान स्थान पर विशाल भण्डारे का आयोजन किया व श्री महाराज जी का पावन जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया । श्री महाराज जी ने प्रातः गढीनेगी में श्री हरेश्वर महादेव का व रामनगर में श्री दिव्येश्वर महादेव का महाभिषेक भी किया।

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