रामनगर। प्रेमावतार, युगदृष्टा, श्री हरि कृपा पीठाधीश्वर व विश्व विख्यात संत स्वामी श्री हरि चैतन्य पुरी जी महाराज ने आज यहाँ श्री हरिकृपा आश्रम में उपस्थित विशाल भक्तसमुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि युगों युगों से मानव मात्र को प्रेम, एकता व सदभाव के दिव्य संदेश विभिन्न संकीर्णताओं, मतभेदों व मतभेदों को भुला देने की प्रेरणा देती चला आ रही है यह भारत की महान संस्कृति। सत्य, धर्म, न्याय, अच्छाई व प्रभु भक्त की सदैव अंत में विजय होती है।
उन्होंने अपने दिव्य व ओजस्वी प्रवचनों में कहा कि समस्त संसार भी चाहे शत्रु क्यों न हो जाए लेकिन पुण्यात्मा हरि भक्त का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। पग पग पर प्रभु को समर्पित, कर्तव्य परायण, दृढ़ निश्चयी भक्त की रक्षा व सहायता करते हैं “श्री हरि”। भक्तराज प्रहलाद का दिव्य व आदर्श जीवन चरित्र सचमुच मानव मात्र के लिए प्रेरणा का स्रोत है। इतिहास साक्षी है कि मिथ्या अहंकार में फूले हुए हिरण्यकश्यप ने स्वयं अपने ही पुत्र प्रह्लाद पर कितने निर्मम अत्याचार किए। जिसका अपराध शायद मात्र इतना था कि उसने परमात्मा का नाम लेना नहीं छोड़ा। लेकिन प्रभु ने सदैव रक्षा की व उस अहंकारी हिरण्यकश्यप का नाश भी किया। भक्त का नाश नहीं हो सकता। परमात्मा की कृपा जिस पर हो उसके लिए विष भी अमृत बन जाता है। शत्रु भी मित्रवत हो जाते हैं। अपार सागर भी गाय के पैर के गड्ढे के समान हो जाता है, अग्नि भी शीतल हो जाती है, सुमेरू जो अलंघ्य पर्वत है जिसे कोई लाँघ नहीं सकता। ऐसा अलंघ्य पर्वत सुमेरू भी उसके लिए रज कण के समान हो जाता है। हर असंभव कार्य भी संभव हो जाता है, कठिनतम कार्य भी सरल हो जाता है, वही प्रहलाद के साथ भी हुआ।
महाराज श्री ने कहा कि दृढ़ विश्वास व सत्य स्नेह परिपूर्ण भक्ति हो तो कोई बाधा दीर्घकाल तक नहीं टिक सकती व यदि किसी कारणवश टिक भी गई तो इतना साहस मिलता है कि व्यक्ति किसी प्रकार की भी बाधाओं, कठिनाइयों, मुसीबतों, परीक्षाओं से विचलित नहीं हो पाता।
उन्होंने कहा कि गया हुआ समय फिर वापिस नहीं लौटता। समय बड़ा अनमोल है । भूतकाल से प्रेरणा लो, हो चुकी गल्तियों को सुधारें, भविष्य के लिए योजना चाहे बनाएँ , बनाते ही न रह जाएँ लेकिन वर्तमान के हर क्षण का सदुपयोग करो, दुरुपयोग तो कदाचित् भी नहीं । समय रहते समय का महत्व समझें तथा एक क्षण भी व्यर्थ के चिंतन, क्रियाकलाप में न गुज़ारे। अधिकांशतः हम अपने मतलब से समय का महत्व स्वीकार करते हैं जहां करना चाहिए वहाँ नहीं । समय पर विवाह न हो, संतान न हो, रोज़गार न लगे, वर्षा न हो तो हमें बुरा लगता है लेकिन समय रहते जीवन के परम सत्य को स्वीकार करके धर्मानुसार भक्ति परिपूर्ण परोपकारी जीवन जीने की कोशिश नहीं करते। समय का सम्मान न करने वाले कभी सम्मान के पात्र नहीं बन पाते।
अपने धारा प्रवाह प्रवचनों से उन्होंने सभी को मंत्रमुग्ध व भाव विभोर कर दिय। सारा वातावरण भक्तिमय हो गया व श्री गुरु महाराज, कामां के कन्हैया व लाठी वाले भैय्या की जय जयकार से गूंज उठा ।
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