धार्मिक आस्था और समृद्ध लोक संस्कृति के साथ स्याल्दे बिखौती मेले में सम्पन्न हुई ‘ओड़ा भेंट’ की रस्म परंपरा 

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द्वाराहाट। पाली पछांऊ क्षेत्र के ऐतिहासिक स्याल्दे बिखौती मेले में इस वर्ष भी आस्था, परंपरा और वीरता का अद्भुत संगम देखने को मिला। मेले में पारंपरिक ‘ओड़ा भेंट’ की रस्म पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न हुई, जिसमें आल और गरख धड़ों के लोगोंने बढ़-चढ़कर भागीदारी की।

ईड़ा, छतीना, बमनपुरी, सलालखोला, ध्याड़ी, हाट, काँला, भुमकिया और तल्ली कहाली सहित आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक वेशभूषा में ढोल-दमाऊं, नगाड़े, मशकबीन, रणसिंघा और तुतुरी जैसे वाद्य यंत्रों के साथ मेले में पहुंचे। वीर रस से ओतप्रोत योद्धाओं ने नगाड़े-निशानों के साथ ‘भेटे ओड़े’ की परंपरा निभाते हुए पूरे क्षेत्र को उत्सवमय बना दिया। ओड़ा स्थल तक पहुंचने के दौरान सांस्कृतिक दलों ने हुड़के-चिमटे की थाप पर झोड़ा-भगनौल गाकर समां बांध दिया। “सिलेंडर नी मिल हो दाज्यू, चुल में फूका फूक…” जैसे लोकगीतों ने लोगों को खूब झुमाया और समकालीन जीवन की झलक भी पेश की।

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पारंपरिक क्रम के अनुसार पहले आल धड़े द्वारा ओड़ा भेंट किया गया, इसके बाद गरख धड़े ने यह रस्म निभाई। आल धड़े की ओर से विजयपुर, किरौली, भौरा, मल्ली मिरई, तल्ली मिरई, डढोली और पिनोली गांवों के सात झोड़े नगाड़ों ने भागीदारी की। वहीं कुल 11 जोड़ी नगाड़ों-निशानों ने इस ऐतिहासिक परंपरा को जीवंत बनाए रखा। ढोल-दमाऊं, रणसिंघा और शंख की गूंज के बीच पूरा क्षेत्र भक्ति और उल्लास में डूबा नजर आया। मेले में पूर्व विधायक महेश नेगी, पुष्पेश त्रिपाठी, ब्लॉक प्रमुख आरती किरौला सहित कई जन प्रतिनिधि और गणमान्य लोग मौजूद रहे।
 
स्याल्दे बिखौती मेला न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह क्षेत्र की समृद्ध लोक संस्कृति,सामूहिकता और परंपराओं को संजोए रखने का सशक्त माध्यम भी बना हुआ है।

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