चीड़ की सूखी पत्तियों से सुरक्षित जंगल, स्वच्छ ईंधन और महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहा चंपावत का हरित मॉडल – मुख्यमंत्री

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गणेश दत्त पाण्डे, खबर सच है संवाददाता
 
प्रकृति के संग विकास की राह: चंपावत में फिरुल से सजी हरियाली, ऊर्जा और आजीविका।
 
चंपावत। पहाड़ की प्रकृति के अनुरूप विकास का सजीव उदाहरण आज चंपावत में देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की परिकल्पना के तहत जिले को मॉडल जिला बनाने की दिशा में उठाया गया कदम अब पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा और ग्रामीण आजीविका के संतुलन का प्रतीक बन गया है। लधियाघाटी के भिगराड़ा गांव में स्थापित फिरुल ब्रिकेट यूनिट ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाकर भी विकास की मजबूत नींव रखी जा सकती है।
 
उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकोस्ट) को नोडल एजेंसी बनाकर भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी) के सहयोग से शुरू की गई यह बायोमास आधारित परियोजना चीड़ की सूखी पत्तियों यानी फिरुल को उपयोगी ईंधन में बदल रही है। इससे एक ओर जंगलों में आग का खतरा कम हुआ है, तो दूसरी ओर स्वच्छ ऊर्जा का नया विकल्प सामने आया है। प्रतिदिन लगभग 10 कुंतल ब्रिकेट उत्पादन करने वाली इस यूनिट से 15 किलोमीटर के दायरे में वनाग्नि की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
 
फिरुल संग्रह के मूल्य में शासन द्वारा की गई बढ़ोतरी ने ग्रामीणों, खासकर महिलाओं की आय में नई जान फूंकी है। ग्राम प्रधान गीता भट्ट के नेतृत्व में भिगराड़ा गांव की करीब 80 महिलाएं इस परियोजना से जुड़कर प्रकृति संरक्षण के साथ-साथ आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। इसी सामूहिक प्रयास और पर्यावरणीय योगदान के चलते इस परियोजना को इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली द्वारा प्रतिष्ठित “स्कॉच अवार्ड” से सम्मानित किया गया है। आईआईपी के वैज्ञानिक पंकज आर्य का कहना है कि
 
करीब 15 लाख रुपये की लागत से  स्थापित यह यूनिट 15 किलोवाट के पावर कनेक्शन पर संचालित हो रही है उनका यह भी कहना है कि उत्तराखंड में उपलब्ध फिरुल की अपार मात्रा राज्य की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पूरा करने में सक्षम है। यदि ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले के साथ सीमित मात्रा में फिरुल ब्रिकेट का उपयोग किया जाए, तो कार्बन उत्सर्जन में बड़ी कमी लाई जासकती है, जिससे पहाड़ की नाजुक पारिस्थितिकी को राहत मिलेगी।
 
स्थानीय स्तर पर भी इस हरित ईंधन को अपनाने की शुरुआत हो चुकी है।गुरुद्वारा श्री रीठा साहिब में इसका सफल प्रयोग किया गया है। आने वाले समय में आवासीय विद्यालयों, मिड-डे मील रसोई, डे-केयर सेंटर और अन्य संस्थानों में भी इसके उपयोग की संभावनाएं हैं।इससे न केवल ईंधन की स्वच्छ उपलब्धता सुनिश्चित होगी, बल्कि गर्मियों में जंगलों में लगने वाली आग और धुएं से भी राहत मिलेगी। श्री आर्य के अनुसार भिगराडा़ यूनिट की सफलता को देखते हुए चम्पावत जिले में दो और इकाईयां स्थापित करने के लिए सर्वेक्षण कार्य किया जा रहा है।जिलाधिकारी मनीष कुमार का कहना है कि चंपावत के चीड़ बहुल क्षेत्रों में इस तरह की और इकाइयां स्थापित की जा सकती हैं। वहीं महिलाओं के रोजगार और कौशल विकास से जुड़ी एपीडी बिम्मी जोशी ने इसे ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बताया है।
 
आईआईपी के वैज्ञानिक डॉ. पंकज आर्य के अनुसार निकट भविष्य में रुद्रप्रयाग, पौड़ी, अल्मोड़ा और बागेश्वर जिलों मेंभी फिरुल ब्रिकेट यूनिटें स्थापित की जाएंगी। प्रकृति के अनुरूप विकास, स्वच्छ ऊर्जा और रोजगार का यह समन्वित मॉडल चंपावत को न केवल राज्य बल्कि पूरे देश में एक नई पहचान दिला रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी परिकल्पना के माडल जिले में पिरुल से ईंधन का विकल्प पैदा किए जाने से काफी उत्साहित हैं। उनका कहना है कि इस प्रयोग ने उत्तराखंड के अन्य चीड़ बाहुल पर्वतीय जिलों में भी इस प्रकार की यूनिटे स्थापित करने के द्वार खोल दिए हैं। 
 

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