बदले की भावना से वैर व क्षमा से प्रेम बढ़ता है: श्री हरि चैतन्य महाप्रभु 

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खबर सच है संवाददाता 
 
गढीनेगी। प्रेमावतार, युगदृष्टा, श्री हरि कृपा पीठाधीश्वर व विश्व विख्यात संत श्री श्री 1008 श्री हरि चैतन्य पुरी जी महाराज ने आज यहाँ श्री हरि कृपा धाम आश्रम में उपस्थित विशाल भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि उन्होंने कहा कि परमात्मा एक ही है। उनके नाम उपासना पद्धतियां विभिन्न हो सकती हैं। हम सभी एक ही सर्वशक्तिमान की संतान हैं जो जीव मात्र का परम सुह्रदय हितैषी है।परमात्मा किसी से भी दूर नहीं है, लेकिन स्वार्थ के दलदल में फंसे इंसान की गति ऐसी है कि वह अपने भीतर स्थित परमात्मा को नहीं पहचान पा रहा है। सत्य को पहचानना,धर्म को पहचानना, दया को अपनाना, शांति मार्ग का चयन करना व क्षमादान में निपुणता ही परमात्मा का सत्य रूप है। सच्चा सुख आनंद व शांति एकमात्र परमात्मा व अध्यात्म की शरण में ही है। परमात्मा से प्रेम, समाज की सेवा व स्वयं की खोज करें। जो प्रभु समर्पित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं उनकी हर प्रकार से देखभाल व रक्षा स्वयं प्रभु करते हैं। लौकिक उन्नति बुरी नहीं, लेकिन प्रभु से विमुख उन्नति अवनति के समान ही है। 
 
उन्होंने कहा कि प्यार बहुत ही छोटा सा शब्द है अगर सच्चा हो तो सारी दुनिया का मालिक भी इससे वश में हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। प्रेम ही ईश्वर है, ईश्वर ही प्रेम है। बशर्ते वह प्रेम विशुद्ध हो, निष्काम हो, निस्वार्थ हो, निष्कपट हों ऐसा विशुद्ध , निस्स्वार्थ, निष्कपट प्रेम परमात्मा का ही स्वरूप है जब यह स्वभाविक हमारे मन में उत्पन्न हो तो लगता है कि सामने वाला कौन है कही ये साक्षात परमात्मा तो नहीं है। लेकिन स्थिर नहीं रहती है बुद्धि, प्रेम, आस्था विश्वास। ये परमात्मा नहीं है तो परमात्मा का कोई निकट जन है ये सदियों से लगता आया है क्योंकि अंत में स्वाभाविक प्रेम परमात्मा या परमात्मा के निज जन के प्रति ही उत्पन्न हो सकता है। परंतु आज दुर्भाग्यवश इसी प्रेम का अभाव सर्वत्र दिखाई देता है आज मूर्खतावश लोग वासनामय संबंधों को प्रेम कह देते हैं जो कि प्रेम का भी अपमान है।
 
उन्होंने कहा कि मानव मन को धर्म व अध्यात्म से ही नियंत्रित किया जा सकता है । इसलिए धर्म विहीन मनुष्य को पशु तुल्य कहा गया है ।आज लोगों के धर्म से भी विमुख होने के कारण ही मानवता की कमी भी दिखाई देने लगी है । हमें समाज को बदलने के लिए लोगों की दृष्टि बदलने की आवश्यकता है। किसी को सुधारने से पहले स्वयं को सुधारना चाहिए । उन्होंने कहा कि बदले की भावना से वैर, क्षमा से प्रेम बढ़ता है। क्षमा कायरों का नहीं वीरों का आभूषण है । यदि सतंता के मार्ग पर बढ़ना चाहे तो अपने अन्दर क्षमा, करुणा, उदारता, कृपा आदि सद्गुणों  को अपनाएं। जीवन मरण, हानि लाभ, सुख दुख के कर्ता धर्ता प्रभू ही हैं। प्रभु का नाम पाप धोने वाली गंगा, विष- वैर  मिटाने वाला अमृत, दुर्जन को सज्जन बनाने वाली तंत्र, मोक्ष मिलने के मंत्र, भवसागर से पार उतारने वाली नौका व स्वर्ग जाने की सीढ़ी है । उन्होंने कहा कि जो आंखें विषय वासना, सांसारिक मोहमाया में फँसी है उन्हें परमात्मा नहीं दिखाई देते। तथा जब संसार नहीं दिखता तो प्रभू दिखते हैं। सन्तों, शास्त्रों व अवतारों को मात्र अपनी कमियां छुपाने की ढाल ही ना बनाएँ । उनसे प्रेरणाएं, शिक्षाएँ व उपदेश भी ग्रहण करके अपने जीवन में उतारकर जीवन को दैवत्व परिपूर्ण बनाए। विचार शील प्राणी कभी भी किसी भी हाल में धर्म व परमात्मा का साथ कदापि भी नहीं छोड़ता। यूँ भी धैर्य ,धर्म ,मित्र व नारी इन चारों की परीक्षा विपत्ति के समय होती है। कब कौन सी बुद्धि उजागर हो जाए कोई कुछ कह नहीं सकता, हाँ अच्छे संग से सुमति व बुरे संग से कुमति ही उत्पन्न होगी।
 
अपने धारा प्रवाह प्रवचनों से उन्होंने सभी को मंत्रमुग्ध व भाव विभोर कर दिया । सारा वातावरण “श्री गुरु महाराज”, “कामां के कन्हैया “व “लाठी वाले भैय्या” की जय जयकार से गूंज उठा ।
 
यहां पहुँचने से पूर्व दानपुर, गदरपुर, बाजपुर व काशीपुर में पधारने पर स्थान स्थान पर बड़ी संख्या में हरि भक्तों ने परम पूज्य श्री महाराज जी का हार्दिक भव्य स्वागत किया। श्री महाराज जी के दर्शनों व अमृत वचनों को सुनने के लिए दिनभर भक्तों का ताँता लगा रहा। स्थान स्थान पर श्री महाराज जी का अग्रिम जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया व विशाल भंडारे का आयोजन किया गया।

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