कहने को यह छात्रसंघ चुनाव है।
कहने को यहां लोकतंत्र की पाठशाला चल रही है।
लेकिन तस्वीरें और घटनाक्रम अगर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो उन्हें नजरअंदाज करना भी लोकतंत्र के साथ न्याय नहीं होगा।
मतगणना के बीच मतपत्र फाड़े जाने की घटना सामने आती है। परिणाम पर आपत्ति जताने का अपना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन क्या आपत्ति जताने का मतलब चुनावी प्रक्रिया के दस्तावेज को ही नष्ट कर देना हो सकता है? और यदि ऐसा हुआ है, तो अगला सवाल कार्रवाई का है।
किसी व्यक्ति पर आरोप लगे तो कानून अपना काम करे। जांच हो, तथ्य सामने आएं और दोष सिद्ध होने पर नियमानुसार कार्रवाई हो। यह किसी व्यक्ति या संगठन के पक्ष-विपक्ष का सवाल नहीं है। लेकिन असली चिंता तब पैदा होती है, जब आम आदमी के मन में यह सवाल उठने लगे कि क्या कानून की सख्ती व्यक्ति की पहचान देखकर बदल जाती है?
बताया जा रहा है कि आरोपी को पुलिस ने अपने संरक्षण में लिया, ताकि भीड़ की संभावित हिंसा से उसे बचाया जा सके। यदि ऐसा हुआ है तो किसी भी व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना पुलिस का दायित्व है।
लेकिन फिर एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है—
अगर यही आरोप किसी ऐसे व्यक्ति पर होता, जिसके पीछे कोई प्रभावशाली संगठन या राजनीतिक पहचान नहीं होती, तो क्या व्यवस्था उतनी ही संवेदनशील दिखाई देती?
इस सवाल का जवाब पुलिस और प्रशासन को अपने व्यवहार से देना होगा।
क्योंकि जनता भाषण नहीं देखती, जनता कार्रवाई देखती है।
छात्रसंघ चुनाव अब सिर्फ कॉलेज परिसर तक सीमित मामला नहीं रह गया है। यहां राजनीतिक दलों और संगठनों की सक्रियता, शक्ति प्रदर्शन, धनबल-बाहुबल के आरोप और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर उठते सवाल लगातार चर्चा में हैं।
ऐसे माहौल में पुलिस की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
पुलिस यदि किसी को बचाती है तो सवाल उठता है—क्यों?
पुलिस यदि किसी पर कार्रवाई करती है तो सवाल उठता है—किस आधार पर? और यदि दो समान परिस्थितियों में कार्रवाई का तरीका अलग दिखाई दे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में निष्पक्षता सिर्फ होनी नहीं चाहिए, दिखाई भी देनी चाहिए।
सरकारी कर्मचारी किसी सत्ता के निजी कर्मचारी नहीं होते। वे संविधान और कानून के अधीन काम करते हैं। सरकारें आती-जाती रहती हैं, राजनीतिक दल बदलते रहते हैं, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब उसका व्यवहार व्यक्ति और संगठन से ऊपर दिखाई दे। वरना जनता के मन में वही पुराना सवाल लौटता है—
क्या व्यवस्था कानून से चलती है या सत्ता के प्रभाव से?
यह सवाल किसी एक दल के लिए नहीं है।
यह सवाल हर उस संगठन के लिए है जो छात्र राजनीति के मैदान में उतरता है।
यह सवाल पुलिस-प्रशासन के लिए है। और यह सवाल उन छात्रों के लिए भी है जो अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदान करते हैं।
छात्रसंघ चुनाव में जीत किसी संगठन की नहीं, छात्रों की होनी चाहिए। हार किसी विचारधारा की नहीं, केवल चुनावी परिणाम की होनी चाहिए। लेकिन यदि मतपत्र फाड़े जाएंगे, हिंसा का माहौल बनेगा, बाहरी प्रभाव की चर्चाएं होंगी और फिर कार्रवाई को लेकर भी सवाल खड़े होंगे, तो आखिर छात्र किस लोकतंत्र पर भरोसा करें?
मतपत्र कागज का टुकड़ा नहीं होता। वह मतदाता के विश्वास का प्रमाण होता है। उस विश्वास को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देना चाहिए।
आज सवाल सिर्फ यह नहीं कि मतपत्र किसने फाड़ा?
सवाल यह है कि उसके बाद व्यवस्था ने क्या संदेश दिया?
और इससे भी बड़ा सवाल—
क्या अगली बार किसी दूसरे खेमे का कोई व्यक्ति यही हरकत करेगा तो व्यवस्था का रवैया भी बिल्कुल यही रहेगा?
अगर जवाब हां है, तो कानून की निष्पक्षता पर किसी को सवाल नहीं करना चाहिए, और अगर जवाब अलग है, तो सवाल मतपत्र से कहीं बड़ा है।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज मतपत्र का फटना नहीं, बल्कि जनता के मन में निष्पक्ष व्यवस्था पर भरोसे का फटना है।