मनोज कुमार पाण्डे ✍️
मुहावरा है—“नीम हकीम खतरे जान।” लेकिन विडंबना यह है कि आज भी छोटी-मोटी शारीरिक तकलीफ होते ही बड़ी संख्या में लोग प्रशिक्षित और डिग्रीधारी चिकित्सक के बजाय ऐसे लोगों के पास पहुंच जाते हैं, जिनकी चिकित्सा-योग्यता पर ही सवाल खड़े होते हैं। कई बार राहत की उम्मीद में उठाया गया यही कदम ऐसी पीड़ा दे जाता है, जिसे जिंदगी भर भुलाना मुश्किल होता है।
पिथौरागढ़ निवासी और दमुवाढूंगा क्षेत्र में रह रहे रामचंद्र के परिवार के साथ सामने आया मामला इसी गंभीर चिंता की ओर इशारा करता है। आरोप है कि उनकी पत्नी गर्दन के दर्द से राहत पाने के लिए एक स्थानीय पहलवान के पास मालिश कराने गई थीं। मालिश के बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और उपचार के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
यह मामला केवल एक परिवार के असहनीय दुख की कहानी नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासन के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल भी है।
आखिर किसी व्यक्ति को इलाज करने का अधिकार किस आधार पर मिल जाता है? यदि कोई व्यक्ति बिना आवश्यक चिकित्सकीय योग्यता के लोगों का उपचार करता है, तो क्या उसे ऐसा करने की अनुमति है? यदि अनुमति नहीं है, तो फिर ऐसी गतिविधियां खुलेआम कैसे चलती रहती हैं? और यदि किसी व्यक्ति के पास चिकित्सा संबंधी कोई मान्यता प्राप्त डिग्री या प्रशिक्षण नहीं है, तो आम नागरिक उसकी दुकान और एक पंजीकृत चिकित्सक के क्लिनिक के बीच अंतर कैसे समझे?
यहां सवाल किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से है जो नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाती है।
एक ओर वर्षों की पढ़ाई, प्रशिक्षण, पंजीकरण और चिकित्सकीय मानकों से गुजरकर डॉक्टर मरीजों का उपचार करते हैं। दूसरी ओर यदि कोई व्यक्ति केवल अपने अनुभव या किसी पारंपरिक कौशल के आधार पर शरीर की मालिश, उपचार या चिकित्सा का दावा करता है, तो दोनों को एक ही नजर से देखना निश्चित रूप से गंभीर चिंता का विषय है।
गर्दन का दर्द मामूली लग सकता है, लेकिन मानव शरीर कोई प्रयोगशाला नहीं है कि जिस पर कोई भी अपने अनुभव के आधार पर प्रयोग कर दे।
इस मामले में पुलिस और स्वास्थ्य विभाग द्वारा कार्रवाई की बात सामने आई है। अब जरूरत केवल जांच और कार्रवाई तक सीमित रहने की नहीं है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति के पास इलाज या मालिश के नाम पर ऐसी प्रक्रिया करने की क्या वैधता थी, महिला की तबीयत बिगड़ने के बाद क्या हुआ और मौत के वास्तविक कारण की पुष्टि चिकित्सकीय जांच से क्या होती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि समय रहते ऐसे अनधिकृत उपचार केंद्रों और तथाकथित इलाज करने वालों की पहचान कर ली जाए, तो शायद किसी दूसरे परिवार को ऐसी त्रासदी से बचाया जा सकता है।
सरकार और प्रशासन को यह तय करना होगा कि स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर कौन व्यक्ति क्या करने के लिए अधिकृत है। साथ ही आम लोगों को भी यह समझना होगा कि हर दर्द का इलाज हर व्यक्ति के पास नहीं होता।
दर्द से राहत पाने की जल्दबाजी कहीं जिंदगी भर का दर्द न बन जाए—यह चेतावनी केवल एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि हम सभी के लिए है।
क्योंकि किसी परिवार का अपना व्यक्ति खो जाने के बाद की कार्रवाई जरूरी जरूर है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि ऐसी नौबत दोबारा न आए।