हल्द्वानी। एमबीपीजी कॉलेज में छात्रसंघ चुनाव को लेकर मंगलवार (कल) मतदान होना है। चुनाव भले ही छात्र प्रतिनिधियों के चयन का है, लेकिन जिस तरह इसके आसपास राजनीतिक दलों से जुड़े समर्थकों की सक्रियता, शक्ति प्रदर्शन और आरोप-प्रत्यारोप दिखाई दे रहे हैं, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या छात्रसंघ चुनाव अब केवल छात्रों के मुद्दों तक सीमित रह गया है?
एमबीपीजी छात्रसंघ चुनाव में करीब 12 हजार विद्यार्थियों के मतदान की बात सामने आई है और चुनाव को लेकर पुलिस-प्रशासन ने सख्त सुरक्षा व्यवस्था लागू की है। लिंगदोह कमेटी के नियमों के पालन, रैली और प्रचार पर नियंत्रण तथा बाहरी लोगों की भूमिका रोकने की बात भी पुलिस की ओर से कही गई है।
लेकिन इसी बीच प्रशासनिक सख्ती की समानता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि एक पक्ष से जुड़े छात्रों की डीजे पार्टी को रात करीब आठ बजे तक चलने दिया गया, जबकि विपक्षी दल से जुड़े छात्र नेता के सहयोगियों की डीजे पार्टी को दोपहर बाद ही पुलिस ने बंद करा दिया।
यदि यह आरोप सही है तो सवाल केवल डीजे पार्टी बंद कराने या जारी रखने का नहीं, बल्कि नियमों के समान और निष्पक्ष अनुपालन का है।
चुनाव में नियम सभी प्रत्याशियों और समर्थकों के लिए समान होने चाहिए। यदि किसी गतिविधि की अनुमति नहीं है तो उस पर कार्रवाई सभी पक्षों के लिए एक जैसी होनी चाहिए। वहीं यदि किसी गतिविधि की अनुमति निर्धारित समय तक है तो उसका पालन भी बिना राजनीतिक पक्ष-विपक्ष देखे समान रूप से होना चाहिए।
छात्रसंघ चुनाव लोकतांत्रिक नेतृत्व की पहली पाठशाला माना जाता है। ऐसे में यदि छात्रों के बीच यह धारणा बनने लगे कि चुनावी मैदान में प्रभाव, बाहुबल, धनबल या राजनीतिक संरक्षण की भूमिका बढ़ रही है, तो यह छात्र राजनीति की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सवाल सीधा है—क्या प्रशासनिक सख्ती सभी के लिए एक समान है?
क्योंकि छात्रसंघ चुनाव में जीत किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि छात्रों के विश्वास की होनी चाहिए। और हार भी किसी राजनीतिक खेमे की नहीं, बल्कि उन विचारों की होनी चाहिए जिन्हें छात्र स्वीकार नहीं करते।
अब देखना यह है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान प्रशासन नियमों को व्यक्ति और पक्ष देखकर लागू करता है या नियम वास्तव में सभी के लिए समान रहते हैं।
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