खबर सच है संवाददाता
रामनगर। प्रेमावतार युगदृष्टा श्री हरि कृपा पीठाधीश्वर एवं विश्व विख्यात संत स्वामी श्री हरि चैतन्य पुरी जी महाराज ने आज यहां श्री हरि कृपा आश्रम में उपस्थित विशाल भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए कहा देवी जगत की उत्पत्ति के समय ब्रह्मसूत्र और जगत की स्थिति में हरि रूप धारण कर लेती है। तथा संहार के समय रूद्र मूर्ति बन जाती है। वह देव और मानव जाति के रक्षार्थ युद्ध करते हुए शत्रुओं का संहार करती है। उन्होंने कहा कि महामोह तथा मिथ्या अहंकार रुपी महिषासुर तथा राग-द्वेष आदि मधु-कैटभ को मारने के लिए गुरु उपदेश, सत्संग, राम-कथा व प्रभु वाणी आदि (ये सब एक ही है) कराल कालिका है। काली हाथ में खडग लेकर महिषासुर (वह असुर जो भैसे का रूप धारण कर आया था।) भैंसे का नही अपितु भैसे के रूप में आए असुर का वध करती है। आज अनेक स्थानों पर इसी के प्रतीक रूप में भैसों की या अन्य जीवो की बलि का अमानवीय व निंदनीय कृत्य महा अपराध है तथा वेद, शास्त्र, संत, गुरु, प्रभु ज्ञानरूपी खड़ग लेकर हमारे अंतर के राक्षसत्व, पांच चोर, महामोह व मिथ्या अहंकार रुपी महिषासुर का वध करते हैं।
उन्होंने कहा कि इस संसार में कर्म, विकर्म, अकर्म को समझना बड़ा ही कठिन है। इनको या तो भगवान जानते हैं या तो भगवद तत्व का अनुभव करने वाले महात्मा लोग जानते हैं। अपने मन से कल्पना कर बैठना की यह पाप है, यह पुण्य है, यह अज्ञानता का लक्षण है। परमात्मा के सिवाय ऐसा कौन है जिसको पाप और पुण्य का साक्षात्कार हुआ हो ? इसी कारण भगवान खरा खोटा नहीं देखते हैं जो उनकी शरण में आ जाए उसे स्वीकार कर लेते हैं। सुख-दुख, हानि-लाभ,यश-अपयश,जीवन- मृत्यु, अनुकूल-प्रतिकूल सभी में परमात्मा की कृपा का सदैव अनुभव करते हुए प्रभु स्मरण व अपने अपने कर्तव्यों का पालन करते रहने में ही कल्याण है।कहा कि अन्तरदृष्टि(दिव्य नेत्र) खुलने पर परमात्मा या आत्मा का स्वरूप दिखाई देगा। बाह्य चर्म नेत्रों से बाह्य चर्म इत्यादि ही दिखता है। वह दिव्य दृष्टि या तो प्रभु कृपा कर के दे दे, जैसे अर्जुन द्वारा विराट रूप देखने की इच्छा जाहिर करने पर प्रभु कहते हैं कि इन नेत्रों से तू मेरे उस स्वरूप को नहीं देख सकता इनसे तो सभी देख रहे हैं किसने पहचाना? तुझे दिव्य नेत्र प्रदान करता हूं उनसे तू मुझे देख। या गुरु कृपा से प्राप्त हो सकते हैं जैसे व्यास जी संजय को प्रदान करते हैं या ऐसा भक्त या संत दे सकता है, जैसे वाह्य नेत्र ना होने के बावजूद धृतराष्ट्र को संजय ने सारा वृतान्त बता दिया व दिखादिया।
उन्होंने कहा कि मानव जीवन की कृत्रिम आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए नहीं बनाया गया, हमें शरीर का केवल निर्वाह कर सन्तुष्टि प्राप्ति करने के साथ-साथ शेष समय ईश्वर आराधना, जरूरतमंदों की सेवा आदि में लगाना चाहिए। सदाचार पूर्ण जीवन बिताएं। राष्ट्रीयता, नैतिकता व चरित्र को भी जीवन में महत्व दें। स्वयं को सुसंस्कारित करके समाज के लिए स्वयं को उपयोगी बनाएं। राष्ट्र में सभी को सभी प्रकार के मतभेदों को त्याग कर आपसी प्रेम, एकता व सद्भाव को बनाये रखना है। देश की अमूल्य व महान संस्कृति के महत्व को समझें व उसे जीवन में अपनाएं। पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण त्यागे।
कहा कि अपनी गलतियों को, दोषो, विकारो, व्यसनों व बुराइयों को कभी छोटा न समझे । छोटी-छोटी कमियां ही एक दिन बहुत बड़ी कमी बन जाती है। जो हमारे जीवन को पतन के कगार पर पहुंचा देती हैं। नित्य आत्मान्वेषण करें। अपने मन की नही, आत्मा की आवाज को सुने। आपके जीवन में वांछित परिवर्तन भी आना चाहिए। धर्म से, गुरु या किसी संत से अथवा परमात्मा से यदि आप जुड़े हैं तो आपका और भी अधिक उत्तरदायित्व हो जाता है कि आपके आचरण, स्वभाव, खानपान, वाणी, संगति आदि और भी श्रेष्ठ हो।
अपने धाराप्रवाह प्रवचनों से उन्होंने सभी भक्तों को मंत्र मुग्ध व भाव विभोर कर दिया। सारा वातावरण भक्तिमय हो उठा।