जो भाव सृजन करदे वो है भागवत – श्री हरि चैतन्य महाप्रभु

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गढीनेगी। प्रेमावतार, युगदृष्टा, श्री हरि कृपा पीठाधीश्वर व विश्व विख्यात संत स्वामी श्री हरि चैतन्य पुरी जी महाराज ने यहाँ श्री हरि कृपा धाम आश्रम में उपस्थित विशाल भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि महाराज श्री ने भागवत शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि ‘भा’ यानी भाव सृजन करने वाली, ‘ग’ यानी गर्व को नष्ट करने वाली, ‘व’ यानी वर्ण व वर्ग भेद को समाप्त करने वाली। ‘त’ यानी तपस्चर्या परिपूर्ण जीवन जीने का संदेश देने वाली। ग्रहस्थ को ही तपोवन बना लें। जंगलों, गुफाओं या हिमालय में तप हेतु जाने की आवश्यकता नहीं है। गंगा व यमुना की तरह पवित्र भाव से आपस में मिलें, जीवन में एक लक्ष्य हो, लक्ष्य की ओर निरंतर प्रयास हो। मनोबल, आत्मबल व आत्मविश्वास बरकरार रखें। परमात्मा का स्मरण करते हुए बाधा,कठिनाईयों, परीक्षाओं से यदि न घबराते हुए निरंतर चलें तो सफलता अवश्य ही क़दम चूमेगी। व ऐसा मिलाप होने पर गंगा व यमुना की तरह एक बार मिलने के बाद कभी संबंध टूटने की कगार पर नहीं आएंगे। श्री राम भरत के मिलाप का उदाहरण देते हुए कहा कि भरत ने स्वयं को राम के रंग में पूरी तरह रंग लिया तो 14 वर्ष की तन की दूरी भी दिल से दूर नहीं कर पाई।
 
महाराज श्री ने कहा कि धर्म लौकिकता व पारलौकिकता के बीच एक सेतु का काम करता है l लौकिक कर्तव्यों का पालन करते हुए पारलौकिक मार्ग पर कैसे आगे बढ़ा जा सके यह सिखाता है धर्म। कर्म,भक्ति व ज्ञान का सुन्दर समन्वय स्थापित करके जीवन को आदर्श, महान ,सुखी व समृद्ध बनाने का संदेश देता है धर्म। सत्य, अहिंसा, परोपकार, राष्ट्र भक्ति, माता पिता व गुरुजनों का सम्मान, सदाचरण, नैतिकता व चारित्रिक उत्थान का संदेश देता है धर्म। हम आज हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी, जैन इत्यादि बनें हैं जिसमें कोई बुराई नहीं लेकिन एक सच्चे इंसान बने हैं या नहीं अंतरात्मा में यह सोचने पर मजबूर करता है धर्म। हम अपने धर्म का सम्मान करे लेकिन औरों का निरादर नहीं। सही दिशा में उठाया हमारा हर क़दम कल्याणकारी होगा।
 
उन्होंने कहा कि वर्तमान में समाज में निरन्तर नैतिकता, राष्ट्रीयता व चरित्र का हो रहा ह्रास अत्याधिक चिंता का विषय हैं। धर्म विज्ञान सम्मत है ढकोसला नहीं, लोगों ने अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए इसे ढकोसला बनाने का प्रयास किया है। धर्म से विज्ञान दूर होने पर ही ढोंग, पाखंड, अंधविश्वास, रूढिवादिताओं को बढावा मिलता है। धर्मविहीन विज्ञान विकास का नहीं, विनाश का कारण बनेगा। धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं। देश को तोड़ने व बाटँने की जो घृणित व कुत्सित साज़िशें की जा रही हैं। उन्हें सफल नहीं होने देना है। राष्ट्र में सभी को सभी प्रकार के मतभेदों व संकीर्णताओं को त्यागकर आपसी प्रेम,एकता व सद्भाव को बनाए रखना हैं।
 
अपने धाराप्रवाह प्रवचनों से उन्होंने सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध व भाव विभोर कर दिया। सारा वातावरण भक्तिमय हो उठा व” श्री गुरु महाराज”, “कामां के कन्हैया” व  “लाठी वाले भैय्या “की जय जयकार से गूंज उठा ।

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