ट्रेड यूनियनों एवं विभिन्न संगठनों ने बुधपार्क में केन्द्र सरकार के विरुद्ध किया संयुक्त प्रदर्शन 

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हल्द्वानी। हल्द्वानी के बुधपार्क में ट्रेड यूनियनों एवं विभिन्न संगठनों द्वारा केन्द्र सरकार के विरुद्ध संयुक्त प्रदर्शन किया।
 
प्रदर्शनकारियों ने मोदी सरकार द्वारा मजदूरों को गुलामी की ओर धकेलने वाले चार श्रम कोड वापिस लेने, बीज विधेयक के विरुद्ध, कॉरपोरट को जमीन संसाधन सार्वजनिक सेक्टर औने-पौने दामों में दिए जाने, बैंक बीमा के निजीकरण के विरोध में, बिजली संशोधन विधेयक के खिलाफ, आशा भोजनमाता जैसी महिला कामगारों समेत सभी मजदूरों को सम्मानजनक वेतन और स्थायी नौकरी की मांग, पुरानी पेंशन योजना को लागू करने, शिक्षा के निजीकरण के लिए लाए जा रहे विधेयक के खिलाफ, खाली पदों में भर्ती की माँग, मनरेगा को बहाल किए जाने और बांटने और नफरत की राजनीति के खिलाफ और अमेरिका के समक्ष शर्मनाक समर्पण के खिलाफ राष्ट्रीय हड़ताल पर हल्द्वानी के बुधपार्क में संयुक्त प्रदर्शन किया। जिसमें सैकड़ों आशाओं, भोजनमाताओं, मजदूरों, किसानों ने भागीदारी की। वक्ताओं ने केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोला और निर्णायक जनआंदोलन छेड़ने का आह्वान किया।
 
ऐक्टू प्रदेश महामंत्री के के बोरा ने कहा कि मज़दूर-विरोधी 4 श्रम संहिताओं को लागू करके मोदी सरकार ने मज़दूर वर्ग पर ताबड़तोड़ हमलों की कड़ी में अब तक का सबसे बड़ा हमला किया है। पूँजीपतियों के मुनाफे को बेलगाम और मज़दूरों को पूर्णतः बंधुआ बनाने के लिए कथित राष्ट्रीय श्रमशक्ति नीति 2025 जारी हुआ; मज़दूर विरोधी चार श्रम संहिताएं घोषित हुईं, फिर केन्द्रीय नियमावली भी जारी हो गई और सरकारें इसे लागू करने में जुट गईं। 
 
बैंक यूनियन के जिला सचिव योगेश पंत ने कहा कि विगत 12सालों में केंद्र सरकार द्वारा मज़दूर अधिकारों पर हमले लगातार तेज होते गए हैं। भारतीय श्रम सम्मेलन 2015 से बंद हो चुका है। बीमा, बैंक, कोल, शिक्षा, इलाज आदि सरकारी-सार्वजनिक उपक्रमों और प्राकृतिक संसाधनों को अंबानी-अडानी जैसे पूंजीपतियों को देने का खेल बेलगाम है। अतिशय महँगाई-बेरोजगारी, वास्तविक मज़दूरी में कमी, ठेका श्रम में वृद्धि और बढ़ती असमानता भयावह है। नई श्रम संहिताएं इन हमलों की धार को और भी तेज कर देंगी।
 
उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन प्रदेश अध्यक्ष कमला कुंजवाल ने कहा कि आशा वर्कर्स की हालत सभी उत्पीड़ित श्रमिकों में सबसे ज्यादा खराब है।उन्हें तो श्रमिक का दर्जा भी नही दिया जाता,बंधुवा मजदूर की तरह काम लिया जाता है। आशा वर्कर्स पर सरकार नए नए काम का बोझ लगातार बढ़ाते जा रही है। शिशु मृत्यु दर कम करने में आशा वर्कर्स का बहुत बड़ा योगदान है, गर्भवती महिलाओं की देख-रेख के लिए आशाओं को आधी रात में भी बिना किसी विभागीय सहायता के दौड़ना पड़ता है। इसके बावजूद आशा वर्कर्स को वेतन देने के नाम पर सिर्फ नाममात्र की प्रोत्साहन राशि और कुछ योजनाओं का कमीशन दिया जाता है। यह खुला शोषण कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
 
बीमा कर्मचारी संघ के कार्यकारी अध्यक्ष पंकज त्रिपाठी ने कहा कि नयी श्रम संहिताओं के मूल में है ‘हायर एण्ड फायर’ यानी मनमर्जी काम पर रक्खो और निकाल दो के माध्यम से मज़दूरों के यूनियन बनाने का अधिकार, सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति, नौकरी की सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे मौलिक अधिकारों को पूर्ण रूप से नष्ट किया जा रहा है। इससे काम के घंटे, ओवरटाइम, अवकाश और कार्य की शर्तों को मनमर्जी मोड़ा-तोड़ा जा सकेगा। छाँटनी-बंदी आसान होगी, ठेका प्रथा कानूनी बना दिया गया है।
 
किसान महासभा के प्रदेश उपाध्यक्ष बहादुर सिंह जंगी ने कहा कि मनरेगा कानून रद्द करके वीबी-जीआरएएम(जी) कानून चालू करने के माध्यम से देश के लगभग 30 करोड़ ग्रामीण मजदूरों के काम के अधिकार पर एक जोरदार प्रहार किया गया है।इस कानून में ग्रामीण श्रमिकों के लिए साल में 100 दिन के काम को बढ़ाकर 125 दिन करने की बात है, लेकिन मुख्य लक्ष्य मज़दूरों के एक बड़े हिस्से को इस अधिकार से वंचित करना है।
 
भाकपा माले नैनीताल जिला सचिव डॉ कैलाश पाण्डेय ने कहा कि देश बुलडोजर से नहीं, संविधान और कानून से चलता है, लेकिन आज बुलडोजर का इस्तेमाल गरीबों, भूमिहीनों के खिलाफ किया जा रहा है। रोजगार के अभाव में जो गरीब पहले पलायन करने को मजबूर थे, आज उन्हीं को विकास और रोजगार के नाम पर उजाड़ा जा रहा है और उन्हें ही विकास का दुश्मन बताया जा रहा है। एक तरफ बुलडोजर और दूसरी तरफ महिलाओं व बच्चियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा – यही भाजपा राज की पहचान बन चुकी है। इन दोनों के खिलाफ समान ताकत और एकजुटता के साथ लड़ाई लड़ने की जरूरत है।
 
प्रगतिशील भोजनमाता संगठन की महासचिव रजनी जोशी ने कहा कि, भोजनमाता 3000 रुपये में घर चलाने पर मजबूर हैं, सरकार उनके साथ 5000 रुपये मासिक का किया गया वादा भी पूरा करने को तैयार नहीं है।
 
अन्य वक्ताओं ने कहा कि पूरे देश में नफ़रत का ज़हर घोलकर और मेहनतकश जनता में विभाजन पैदा कर केन्द्र सरकार का यह क़दम मज़दूरों को अधिकारविहीन नग्न गुलामी की तरफ धकेलने का सुनियोजित प्रयास है। यह मजदूर वर्ग पर संगठित, खतरनाक और जालिमाना हमला है, जिसे मज़दूरों के प्रतिरोध और एकजुट संघर्ष से ही रोका जा सकता है।
 
अपील की गई कि केन्द्र सरकार के इस फासीवादी हमले के खिलाफ आज भारत के मज़दूर वर्ग को धर्म, जाति, नस्ल और लिंग से परे और ठेका-स्थाई, संगठित-असंगठित, सरकारी-निजी आदि सभी बंटवारे की दीवारों को तोड़कर एक मज़दूर के रूप में एकमुठ-एकजुट होकर प्रतिरोध करना होगा। फासीवादी ताकतों और देशी-विदेशी बड़े पूंजीपतियों के हितों में लगातार बढ़ते इस हमले के खिलाफ हमें खड़ा होना होगा। आज समय आ गया है कि देश के सभी मज़दूर इस भयानक हमले के खिलाफ एकजुट हों।
 
इस दौरान राष्ट्रीय हड़ताल में ऐक्टू, उत्तराखंड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन, प्रगतिशील भोजनमाता संगठन, बैंक यूनियन, बीमा कर्मचारी संघ, किसान महासभा, भाकपा माले, सनसेरा श्रमिक संगठन, मानव अधिकार रक्षा अभियान, पछास, क्रालोस, आइसा, भीम आर्मी, निर्माण मजदूर यूनियन आदि संगठनों ने हिस्सेदारी की। जिसमें मुख्य रूप से के के बोरा, कमला कुंजवाल, रिंकी जोशी, रजनी जोशी, पुष्पा कुड़ाई, चंपा, बबीता, देवकी भट्ट, राधा नयाल, सरोज रावत, योगेश पंत, पंकज त्रिपाठी, अशोक कश्यप, हिमांशु चौधरी, नरेश जोशी, नफीस अहमद खान, नवीन आर्य, सुलेमान मलिक, चंदन, वेद प्रकाश, इस्लाम हुसैन, बची सिंह बिष्ट, धन सिंह गड़िया, दीपक कांडपाल, रीना आर्य, पंकज चौहान, मनोज आर्य, आकाश भारती, आर पी गंगोला, सुंदर लाल बौद्ध, गीता थापा, यशोदा बोरा, प्रीति रावत, मुकेश भंडारी, कमला देवी, सायमा सिद्दीकी, भगवती, रीता इस्लाम, मनोज पांडे, दीपा बिष्ट,सुमन बिष्ट,  किरन पडलिया, सुंदर लाल बौद्ध, मुमताज, तुलसी आर्य, सुधा, पार्वती, सुनीता, गीता, रश्मि जोशी, कमलेश बोरा, मिथिलेश, धीरज कुमार, समेत सैकड़ों लोग शामिल रहे।
 
कार्यक्रम की अध्यक्षता जोगेंद्र लाल ने और संचालन डॉ कैलाश पाण्डेय ने किया।
 
 
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