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हरक सिंह रावत ने आरोपों को बताया राजनीतिक साजिश, धामी समेत भाजपा नेताओं पर मानहानि का मुकदमा करने की दी चेतावनी
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में करीब 23 साल पहले सुर्खियों में आया बहुचर्चित जेनी प्रकरण एक बार फिर गरमा गया है। शनिवार को जेनी उर्फ इंदिरा देवी ने देहरादून में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत पर कई गंभीर आरोप लगाए। महिला ने दावा किया कि वर्ष 2003 में जब वह महज 16 साल की थी, तब उसके साथ दुष्कर्म किया गया। उसने गर्भवती होने के बाद मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलने तथा तत्कालीन जांच प्रक्रिया में अनियमितताओं के भी आरोप लगाए। महिला ने पूरे मामले की दोबारा सीबीआई जांच कराने और अपने 23 वर्षीय बेटे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की है।
वहीं, हरक सिंह रावत ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए भाजपा की राजनीतिक साजिश करार दिया है। उन्होंने कहा कि मामले में पहले ही सीबीआई और डीएनए जांच हो चुकी है तथा न्यायालय भी अपना फैसला सुना चुका है। उन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और कुछ सोशल मीडिया पत्रकारों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज कराने की बात कही है।
16 साल की उम्र में देहरादून आने और एसटीडी बूथ पर काम करने का दावा
प्रेस कॉन्फ्रेंस में जेनी ने वर्ष 2002-03 के घटनाक्रम का जिक्र करते हुए बताया कि वह अक्तूबर 2002 में करीब 16 वर्ष की उम्र में देहरादून आई थी। यहां वह एक एसटीडी बूथ पर काम करती थी। इसी दौरान एक कार्यकर्ता के माध्यम से उसकी मुलाकात तत्कालीन मंत्री हरक सिंह रावत से कराई गई। महिला के मुताबिक, इसके बाद वह करीब डेढ़ से दो महीने तक यमुना कॉलोनी में रही।
उसने आरोप लगाया कि इस दौरान उसे कई होटलों में ले जाया गया और घर, होटलों तथा विभिन्न पार्टियों में उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया गया। महिला का कहना है कि उस समय हरक सिंह रावत राजनीतिक रूप से प्रभावशाली स्थिति में थे, जिसके चलते उसे न्याय और मदद नहीं मिल सकी।
गर्भवती होने के बाद मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का आरोप
जेनी ने आरोप लगाया कि गर्भवती होने के बाद उसकी परेशानियां और बढ़ गईं। उसे झूठे आरोप लगाकर मानसिक चिकित्सालय में भर्ती करा दिया गया। महिला के अनुसार, उस समय उसे हिंदी भाषा की पर्याप्त जानकारी नहीं थी और वह कानूनी एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं को भी समझने की स्थिति में नहीं थी।
उसने दावा किया कि वहां उसके साथ मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की गई तथा दबाव बनाकर कई दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए। महिला का कहना है कि उसे यह तक मालूम नहीं था कि जिन दस्तावेजों पर वह हस्ताक्षर कर रही है, उनमें क्या लिखा है और उनके कानूनी परिणाम क्या हो सकते हैं।
तत्कालीन वकील और जांच प्रक्रिया पर भी उठाए सवाल
महिला ने उस समय की कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि उसकी ओर से नियुक्त वकील ने भी उसके हितों के अनुरूप पैरवी नहीं की। उसका दावा है कि भाषा और कानूनी जानकारी के अभाव में वह अपने अधिकारों को ठीक से समझ नहीं पाई और उसकी बात को गंभीरता से नहीं सुना गया।
जेनी ने तत्कालीन सीबीआई जांच पर भी सवाल उठाए। उसने दावा किया कि सीबीआई की टीम उससे मिलने मानसिक चिकित्सालय में केवल एक बार आई थी। महिला का आरोप है कि उसके बेटे का डीएनए सैंपल ही नहीं लिया गया था। ऐसे में डीएनए जांच किस आधार पर हुई, इसकी भी दोबारा समीक्षा होनी चाहिए।
23 वर्षीय बेटे की पहचान के लिए डीएनए टेस्ट की मांग
जेनी ने कहा कि उसका बेटा अब 23 वर्ष का हो चुका है और वह अपने पिता की पहचान जानना चाहता है। महिला के मुताबिक, इतने वर्षों बाद भी उसके बेटे को अपने पिता का नाम नहीं मिल पाया है। इसी कारण वह चाहती है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और डीएनए परीक्षण दोबारा कराया जाए, ताकि पितृत्व को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सके।
2016 में दिल्ली में भी शिकायत करने की कोशिश का दावा
महिला ने वर्ष 2016 के घटनाक्रम का जिक्र करते हुए बताया कि वह उस समय दिल्ली में हरक सिंह रावत के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने पहुंची थी। उसने आरोप लगाया कि वहां भी उसके साथ जबरदस्ती की गई। इस मामले में उसने अपने तत्कालीन वकील शिव चरण सिंह रावत की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए उनकी गिरफ्तारी की मांग की।
डीजीपी को पत्र देकर मुकदमा दर्ज करने की मांग
जेनी उर्फ इंदिरा देवी ने उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर वर्ष 2003 में कथित दुष्कर्म के मामले में हरक सिंह रावत के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने और पूरे प्रकरण की दोबारा सीबीआई जांच कराने की मांग की है।
महिला ने कहा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से सार्वजनिक रूप से जेनी प्रकरण का जिक्र किए जाने के बाद उसे सामने आकर अपनी बात रखने का साहस मिला। उसने दावा किया कि इससे पहले शिकायत लेकर पहुंचने पर पुलिस ने उसे दोबारा नहीं आने की बात कहकर लौटा दिया था। अंकिता भंडारी प्रकरण के बाद जब उत्तराखंड की राजनीति में जेनी प्रकरण फिर चर्चा में आया तो उसने देहरादून पहुंचकर अपनी बात सार्वजनिक करने का निर्णय लिया।
हरक सिंह रावत बोले- अंकिता प्रकरण से ध्यान भटकाने की साजिश
दूसरी ओर, कांग्रेस भवन में पत्रकारों से बातचीत करते हुए हरक सिंह रावत ने जेनी के आरोपों को भाजपा की राजनीतिक साजिश बताया। उन्होंने कहा कि अंकिता भंडारी प्रकरण से जनता का ध्यान भटकाने के लिए करीब 23 साल पुराने मामले को दोबारा उछाला जा रहा है।
हरक सिंह रावत ने दावा किया कि जेनी प्रकरण में पहले ही सीबीआई जांच और डीएनए परीक्षण हो चुका है तथा न्यायालय इस मामले में फैसला सुना चुका है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी को जांच या उसके निष्कर्षों पर आपत्ति थी तो उसे उसी समय सामने आना चाहिए था। इतने वर्षों बाद मामले को फिर उठाए जाने के पीछे राजनीतिक मंशा दिखाई देती है।
उन्होंने भाजपा पर उनकी राजनीतिक छवि धूमिल करने का प्रयास करने का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और कुछ सोशल मीडिया पत्रकारों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज कराने की बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि अपनी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ वह कानूनी कार्रवाई करेंगे और न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।
तत्कालीन केंद्र सरकार का भी किया जिक्र
हरक सिंह रावत ने तत्कालीन सीबीआई जांच का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस समय इस मामले की जांच हुई थी, उस दौरान केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार थी। ऐसे में अब भाजपा की ओर से जांच पर सवाल उठाए जाने पर तत्कालीन केंद्र सरकार की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा इस प्रकरण को राजनीतिक मुद्दा बनाकर प्रदेश के अन्य महत्वपूर्ण मामलों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।
अब पुलिस की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
करीब 23 साल पुराने जेनी प्रकरण में एक बार फिर आमने-सामने आए आरोपों और राजनीतिक दावों ने उत्तराखंड की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। एक ओर महिला ने पुराने जांच रिकॉर्ड की समीक्षा, निष्पक्ष जांच और डीएनए परीक्षण की मांग उठाई है, तो दूसरी ओर हरक सिंह रावत ने आरोपों को राजनीतिक साजिश बताते हुए कानूनी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया है।
फिलहाल प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए गए नए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। अब निगाहें डीजीपी को दिए गए पत्र पर पुलिस की कार्रवाई, पुराने जांच एवं न्यायिक रिकॉर्ड की समीक्षा और दोबारा जांच की मांग पर सरकार के रुख पर टिकी हैं।




