खबर सच है संवाददाता
हल्द्वानी। प्रेमावतार, युगदृष्टा, श्री हरि कृपा पीठाधीश्वर व विश्व विख्यात संत स्वामी श्री हरि चैतन्य पुरी जी महाराज ने आज यहां पीलीकोठी में उपस्थित विशाल भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि दुख, अशांति, कलेह-क्लेश, उलझन शोक भय, आदि से लाख प्रयास करके भी लोग बच नहीं पा रहे हैं। बहुत से लोगों को देखें तो उस हिरण की तरह है जो जाल में से निकलने की कोशिश करता है परंतु अपने सिंगो के भी कारण उस जाल में और भी फंसता चला जाता है। दुख-सुख, हानि-लाभ, जीवन-मृत्यु, अनुकूल-प्रतिकूल, यश-अपयश इत्यादि विभिन्न प्रकार की परिस्थितियां आती जाती रहती है। संसार, परिस्थितियाँ, प्राणी-पदार्थ इत्यादि सभी परिवर्तनशील है, परंतु विचारशील प्राणी कभी भी किसी भी हाल में धर्म व परमात्मा का साथ कभी नहीं छोड़ता। सुख के साधन होना व सुखी होना दोनों में बहुत अंतर है। सच्चा सुख धर्म व परमात्मा की शरण में ही प्राप्त होगा।
अपने ओजस्वी व दिव्य प्रवचनों में उन्होंने कहा कि परमात्मा का स्मरण हृदय से करते हुए कर्म करें। जगत की यथासामर्थ्य सेवा तथा परमात्मा व संतों से प्रेम करें। बदले की भावना से वैर, क्षमा से प्रेम बढ़ता है। क्षमा कायरों का नहीं, वीरों का आभूषण है। यदि आपके अंदर बदले की भावना, ईर्ष्या, द्वेष, विरोध है वहां नर्क है। तथा प्रेम, एकता व सद्भाव है वही स्वर्ग है। यदि संतता के मार्ग पर बढ़ना चाहे तो अपने अंदर, क्षमा, करूणा, उदारता, कृपा आदि सद्गुणों को अपनाएं। उन्होंने कहा कि सद्भाव मुक्ति व असद्भाव पतन का मार्ग है। यथासंभव व्यर्थ के उलझाव व टकराव से बचने का प्रयास करें। जहां मान व प्रतिष्ठा की कामना होती है वहां दंभ व कपट को आश्रय मिल जाता है। आज समाज सुधारकों की नहीं, समाज सेवकों की आवश्यकता है।हमारे आंतरिक भाव जिस प्रकार से होंगे धीरे-धीरे बाहरी चेष्टाएँ भी वैसी होने लगेगी। जब कोई व्यक्ति निष्पक्ष व शांत होकर अपनी अंतरात्मा से परामर्श लेता है तो उसे सदैव सत्यपरामर्श ही प्राप्त होता है। संसार में किसी को भी, कभी भी,किसी प्रकार से भी दुख, भय या क्लेश नहीं पहुंचाना चाहिए। ना ही पहुंचाने की प्रेरणा या इच्छा करनी चाहिए। सदैव सत्य स्वरूप परमात्मा की शरण लेनी चाहिए। जिस सत्य में कपट होता है वह सत्य, सत्य नहीं समझा जाता।
कहा कि हमें साधन के प्राप्त हो जाने पर साध्य का परित्याग नहीं करना चाहिए। सच्चे हृदय की प्रेम विश्वास व श्रद्धा से परिपूर्ण पुकार को प्रभु अवश्य सुनते हैं। हम सभी को प्रभु व गुरु पर पूर्ण लगन व निष्ठा से अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। भगवान की कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए कृपापात्र होना जरूरी है। उसकी ही कृपा है कि हमें यह मानव शरीर प्राप्त हुआ है। परंतु भगवान की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए सदाचरण व सच्चा प्रेम परिपूर्ण भक्ति का होना जरूरी है। यदि मनुष्य इस तरह से भगवान से प्रेम, संसार की यथासम्भव व यथासामर्थ्य सेवा तथा अपनी खोज करें तो जीवन सुखमय व आनंदमय हो जाएगा।
अपने धारा प्रवाह प्रवचनों से उन्होंने सभी भक्तों को मंत्र मुग्ध व भाव विभोर कर दिया। सारा वातावरण भक्तिमय हो उठा व श्री गुरु महाराज “कामां के कन्हैया” व लाठी वाले भैय्या की जय जयकार से गूंज उठा।
यहां पहुँचने से पूर्व हल्द्वानी में परम पूज्य महाराज श्री अनेक व्यस्त कार्यक्रमों के अलावा कृष्णा कॉलोनी ऊँचापुल, आदर्श नगर, पीलीकोठी, सुभाष नगर व शांति विहार ऊँचापुल भक्तों की विशेष प्रार्थना पर पधारे। विशाल भक्त समुदाय ने श्री महाराज जी का भव्य हार्दिक स्वागत किया ।