ज्ञान के महासागर ईश्वरचंद्र विद्यासागर 

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प्रस्तुति – नवीन चन्द्र पोखरियाल खबर सच है संवाददाता

ईश्वर चन्द्र का जन्म हिन्दू ब्राह्मण परिवार में थकुरदास बांंडोपाध्याय और भगवती देवी के लिए 26 सितंबर 1820 को पश्चिम बंगाल के पश्चिम बंगाल के पश्चिम पूर्व बंगाल के पश्चिम पूर्व बंगाल के घायल उपखंड में बिर्सिंगा गाँव में हुआ था। 9 वर्ष की आयु में, वह कलकत्ता गए और   बुराबाजार में भागबत चरण के घर में रहने लगे जहां ठाकुरदास कुछ वर्षों से पहले ही रह रहे थे। उन्होंने 1829 से 1841 के दौरान संस्कृत कॉलेज में वेदांत, व्याकरण, साहित्य, रेटोरिक, स्मृति और नैतिकता सीखी। उन्होंने नियमित छात्रवृत्ति अर्जित की। उन्होंने सन् 1839 में संस्कृत में एक प्रतियोगिता परीक्षण ज्ञान में भाग लिया और ‘विद्यासागर’ का अर्थ अर्जित किया जिसका अर्थ ज्ञान का महासागर था। उसी वर्ष ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने सफलतापूर्वक अपनी कानून परीक्षा को मंजूरी दे दी। विद्यासागर ने 14 वर्ष की आयु में दीनामनी देवी से विवाह किया और उनके घर में एक पुत्र का जन्म हुआ जिनका नाम नारायण चन्द्र रखा गया।

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विद्यासागर को संस्कृत कॉलेज में प्रचलित मध्यकालीन शैक्षिक प्रणाली को पूरी तरह से पुनर्निर्मित करने और शिक्षा प्रणाली में आधुनिक अंतर्दृष्टि लाने की भूमिका के साथ श्रेय दिया जाता है। जब वह प्रोफेसर के रूप में संस्कृत कॉलेज वापस आए, तब विद्यासागर ने पहला परिवर्तन संस्कृत के अलावा अंग्रेजी और बंगाली को सीखने के माध्यम के रूप में शामिल करना था। उन्होंने वैदिक ग्रंथों के साथ यूरोपीय इतिहास, दर्शनशास्त्र और विज्ञान के पाठ्यक्रम पेश किए। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ब्रह्म समाज नामक संस्था के सदस्य थे। स्त्री की शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने विधवा विवाह और विधवाओ की दशा सुधारने का पुण्य कार्य भी किया। इसके लिए ईश्वरचंद्र विद्यासागर को बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अंत में विधवा विवाह को क़ानूनी स्वीकृति प्राप्त हो गयी। सुधारवादी विचारधाराओ का जनता के बीच प्रचार करने के लिए ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अंग्रेजी व बंगला में पत्र निकाले। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के अनवरत प्रचार का ही नतीजा था कि ‘विधवा पुनर्विवाह क़ानून-1856’ पारित हो सका। 

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ईश्वर चन्द्र ने वर्ष 1848 में वैताल पंचविंशति नामक बंगला भाषा की प्रथम गद्य रचना का प्रकाशन किया था। वे ग़रीबों व दलितों के संरक्षक माने जाते थे। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने ‘मेट्रोपोलिटन विद्यालय’ सहित अनेक महिला विद्यालयों की स्थापना करवायी तथा वर्ष 1848 में वैताल पंचविंशति नामक बंगला भाषा की प्रथम गद्य रचना का भी प्रकाशन किया। नैतिक मूल्यों के संरक्षक और शिक्षाविद विद्यासागर जी का मानना था कि अंग्रेज़ी और संस्कृत भाषा के ज्ञान का समन्वय करके ही भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं के श्रेष्ठ को हासिल किया जा सकता है।

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19वी शताब्दी के महान विभूति ईश्वरचंद्र विद्यासागर का कहना था की कोई भी व्यक्ति अच्छे कपडे पहनने, अच्छे मकान में रहने तथा अच्छा खाने से ही बड़ा नहीं होता बल्कि अच्छे काम करने से बड़ा होता है। उन्होंने अपने समय में फैली अशिक्षा और रूढ़िवादिता को दूर करने का संकल्प लिया। अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए उन्होंने शैक्षिक, सामाजिक और महिलाओ की स्थिति में सुधार किये। अपनी सहनशीलता, सादगी तथा देशभक्ति के लिए प्रसिद्ध और एक शिक्षाशास्त्री के रूप में विशिष्ट योगदान करने वाले ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का निधन 29 जुलाई, 1891 को कोलकाता में हुआ। विद्यासागर जी ने आर्थिक संकटों का सामना करते हुए भी अपनी उच्च पारिवारिक परम्पराओं को अक्षुण्ण बनाए रखा था। संकट के समय में भी वह कभी अपने सत्य के मार्ग से नहीं डिगे। उनके जीवन से जुड़े अनेक प्रेरक प्रसङ्ग आज भी युवा वर्ग को प्रेरणा प्रदान करते हैं।

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