वह व्यवहार औरों से ना करें जो तुम्हें अपने लिए अच्छा नहीं लगता- श्री हरि चैतन्य महाप्रभु 

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खबर सच है संवाददाता 
 
गढीनेगी। प्रेमावतार, युगदृष्टा, श्री हरि कृपा पीठाधीश्वर व विश्व विख्यात संत स्वामी श्री हरि चैतन्य पुरी जी महाराज ने यहाँ श्री हरि कृपा धाम आश्रम में उपस्थित विशाल भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि ईश्वर ही सत्य है,समस्त संसार मिथ्या है।परमात्मा को प्राप्त सत्पुरुष में दिखने वाले गुण भी सत् है।जैसे सद्गुण,सद्भाव, सद्विचार, सदव्यवहार व सत्यभाषण इत्यादि जिसमें यह सब है वह सत्पुरुष हैं। तथा ऐसे सत्पुरुषों, उनके विचारों या सदाचारों का संग ही सत्संग है। संग का प्रभाव अवश्य पड़ता है। अच्छा संग करो, अच्छा देखो, अच्छा बोलो, अच्छा सुनो, अच्छा विचारो। सत्संग का जीवन में प्रत्यक्ष फल सेवन करते ही दिखाई देगा। जिनका जीवन कौए व बगुले जैसा है वह कोयल व हंस जैसे बन जाएंगे। उनकी वाणी में कोमलता, सह्रदयता, मिठास इत्यादि होंगे व दिखावे से रहित अंदर व बाहर से पवित्र, विवेकशील बन जाएंगे । 
 
अपने दिव्य व ओजस्वी प्रवचनों में उन्होंने कहा कि संत तो संतता के गुणों से है ना कि बाहरी वेशभूषा, दिखावा इत्यादि से। साधु,भक्त या महात्मा बनकर जो लोगों को धोखा देते हैं वह स्वयं को धोखा देते हैं। वह अपना जीवन पापमय बनाते हैं दूसरों का अहित चाहने वाले या करने वाले का कभी भी हित नहीं होता है। पतन या पाप का कारण प्रारब्ध नहीं है बल्कि विवेक का अनादर करके कामना के वश में होने पर मनुष्य पाप कर करता है तभी उसका पतन होता है। किसी भी स्थिति, अवस्था, प्राणी, पदार्थ, वस्तु आदि से जो सुख की आशा रखता है वह कभी सुखी नहीं हो सकता। वह सदैव निराश ही रहेगा व दुखी रहेगा। सच्चा सुख तो परमात्मा की ही शरण में है। कहा कि सभी अपने अपने कर्तव्यों का पालन करें। इससे अधिकार प्राप्ति की लड़ाई समाप्त हो जाएगी। क्योंकि एक का कर्तव्य दूसरे का अधिकार है। वह व्यवहार औरों से ना करें जो तुम्हें अपने लिए अच्छा नहीं लगता। हम दूसरों को प्रेरणा, उपदेश या शिक्षा देने से पूर्व अपने जीवन में भी उतारें वरना उसका प्रभाव नहीं होगा। परमात्मा के नाम की महिमा का वर्णन किया। नाम को राम से भी बड़ा बताया। भारतीय संस्कृति में कदम कदम पर संस्कारों का भी उल्लेख व महत्व को प्रेमरस मर्मज्ञ महाराज श्री ने विस्तार से भक्तों को समझाया। 
 
महाराज श्री ने कहा कि हम सभी को प्रभु व गुरु पर पूर्ण विश्वास रखते हुए तथा अपना आत्मविश्वास बढ़ाते हुए पूर्ण लगन व निष्ठा से अपने अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। स्वयं को शक्ति संपन्न बनाने का प्रयास करें। अपनी शक्तियों को गलत खानपान, अनियमित, असंतुलित, अनियंत्रित दिनचर्या,चरित्र हीनता व कुपथ पर चलकर नष्ट ना करें।शांति का दुरुपयोग ना हो जाए इसलिए बल के साथ साथ बुद्धि व विवेक का भी इस्तेमाल करें। एकमात्र धर्म व अध्यात्म ही हमें हमारे पतन, समाज में आ रही बुराइयों व विकृतियों से बचा सकता है। अतः सदा सर्वदा धर्म व परमात्मा की शरण ग्रहण करें। कहा संतों, शास्त्रों, महापुरुषों व अवतारों से प्रेरणाये, शिक्षाएं व उपदेश ग्रहण करके अपने जीवन को आदर्श दिव्य तो बनाए ही लेकिन जिन्हें हम नीच व अधर्मी मानते हैं अगर उनके जीवन से भी हमें कुछ अच्छाई मिल जाती है तो उसे भी अपने जीवन में उतारें । जिसको अच्छाई लेनी होती है तो वह नीच से नीच व्यक्ति से भी ग्रहण कर लेते हैं वरना दुर्योधन की तरह श्रीकृष्ण से भी नहीं।
 
अपने धाराप्रवाह प्रवचनों से उन्होंने सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध व भावविभोर कर दिया। सारा वातावरण भक्तिमय हो गया व “श्री गुरु महाराज, कामां के कन्हैया व लाठी वाले भैय्या ” की जय जयकार से गूंज उठा।

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