लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है…

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कभाड़ की गाड़ियों को ढ़ोने के लिए क्रेन मंगाते है यह तो खूब सुना है, लेकिन कभाड़ की क्रेन सड़क से गाड़ी उठा कर गंतब्य तक ले जाए क्या मुमकिन है? ऐसा ही कुछ आज मीडिया की सुर्खियां बना वक्तब्य उनके मुखारबिंद से सुनने को मिल रहा है, जिनका खुद का अस्तित्व नहीं।


फील्ड पर खेल जीतने चला कैप्टन बेशक अपने पक्ष में अनाड़ियों को स्थान तो दे रहा, पर क्या ये अनाड़ी उसे गेम जिताने में सक्षम होंगे। क्योंकि कभी यही अनाड़ी अनाप-सनाप बॉलिंग करते हुए, रन लेने को भाग रहे इसी कैप्टन को टंगड़ी देकर रन आउट करने में भागीदार थे। आज जब टंगड़ीबाजो को किसी टीम में जगह नहीं मिली तो हरदा की टीम में रहकर फिरकी देने चलें आएं। इनता ही नहीं यही वह खिलाड़ी है जो आज से पूर्व कांग्रेस की पूर्व कबीना मंत्री के खिलाफ लड़ने का दावा कर स्वयं को जनता में सुपीरियर बनाने की चाह पाले थे।


बहरहाल कैप्टन कितना समझदार है इसका पता तो टूर्नामेंट के बाद ही पता चलेगा, लेकिन बिना गेम फीस के मैच में सम्मिलित हुए यह गेमचेंजर अपनी उपस्तिथी से खेल का यह हाल न करदे कि कहते बने…

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है,

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

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