मनोज कुमार पाण्डे
छात्रसंघ चुनाव था…
लेकिन जिस तरह इस चुनाव में राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े संगठनों ने अपनी ताकत झोंकी, उसे देखकर सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह वास्तव में छात्रों का चुनाव था या राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का एक और अखाड़ा?
छात्रों के मुद्दे पीछे छूट गए।
रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता, कॉलेज की व्यवस्था, फीस, छात्रावास, परिवहन और मूलभूत सुविधाओं जैसे सवाल चुनावी शोर में कहीं दब गए। सामने रह गया तो सिर्फ संगठन, शक्ति, भीड़, मंच और राजनीतिक प्रभाव। कहा जाता है कि छात्र राजनीति लोकतंत्र की पहली पाठशाला है। लेकिन अगर इसी पाठशाला में धनबल और बाहुबल की चर्चा ज्यादा हो और छात्रहित की कम, तो सवाल केवल छात्र नेताओं से नहीं, पूरी व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।
एमबीपीजी कॉलेज के चुनाव ने इस सवाल को और गहरा कर दिया।
एक तरफ बड़े छात्र संगठनों का राजनीतिक प्रभाव और संगठनात्मक ताकत दिखाई दी, दूसरी तरफ निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में था। प्रचार के आखिरी दौर में बड़े-बड़े मंच और कार्यक्रम चर्चा में रहे। नियमों को लेकर सवाल उठे। प्रशासन की भूमिका पर भी चर्चाएं हुईं और यहीं लोकतंत्र की असली परीक्षा शुरू होती है।
नियम अगर हैं तो सबके लिए हैं।
किसी संगठन का झंडा बड़ा हो या किसी राजनीतिक दल का प्रभाव बड़ा—कानून और चुनावी नियम उससे बड़े होने चाहिए। अगर किसी आयोजन को लेकर अनुमति, समय या आचार संहिता के सवाल हैं तो प्रशासन को उसका जवाब देना चाहिए, क्योंकि प्रशासन की निष्पक्षता केवल कार्रवाई करने में नहीं, सभी के लिए समान मापदंड लागू करने में दिखाई देती है। लेकिन इस पूरे चुनाव की सबसे दिलचस्प तस्वीर मतपेटी से बाहर आई।
जिस चुनाव में बड़े संगठन अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में थे, वहां निर्दलीय आर्यन बेलवाल का आगे निकलना राजनीतिक समीकरणों के लिए निश्चित रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। यह किसी एक संगठन की हार या जीत से ज्यादा बड़ा सवाल खड़ा करता है—
क्या छात्र अब संगठन के झंडे से ज्यादा उम्मीदवार को देख रहे हैं?
अगर जवाब हां है तो छात्र राजनीति के पुराने गणित पर सवाल उठना तय है।
क्योंकि भीड़ हमेशा वोट नहीं होती।
मंच हमेशा मतपेटी नहीं होता।
नारा हमेशा जनसमर्थन नहीं होता।
और राजनीतिक संरक्षण हमेशा छात्र का विश्वास नहीं होता।
अब असली खेल चुनाव परिणाम के बाद शुरू होने की आशंका है।
कल तक जो निर्दलीय था, क्या उसे अब किसी खेमे में लाने की कोशिश होगी?
क्या उसे सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने-अपने पाले में खींचने की कोशिश करेंगे?
क्या उसके समर्थन को राजनीतिक समर्थन में बदलने की कवायद होगी? और अगर ऐसा होता है तो सवाल फिर वही होगा—
जिसे छात्रों ने निर्दलीय चुना, उसे राजनीतिक खेमों का हिस्सा बनाने की कोशिश क्यों?
यहीं छात्र राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना सामने आती है।
चुनाव से पहले छात्र को स्वतंत्र उम्मीदवार चाहिए और चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरणों को स्वतंत्र उम्मीदवार चाहिए। अगर छात्र ने किसी प्रत्याशी को बिना राजनीतिक बैनर के चुना है तो उस जनादेश का सम्मान होना चाहिए। उसे तुरंत किसी पार्टी की जीत या हार का हिस्सा बना देना छात्र मतदाता के फैसले को छोटा करना होगा।
यह चुनाव केवल अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं है।
यह उस सोच की भी परीक्षा है जिसमें छात्र यह तय करता है कि उसे किसी संगठन का चेहरा चाहिए या अपनी आवाज का प्रतिनिधि। राजनीतिक दलों को भी यह समझना होगा कि कॉलेज का परिसर विधानसभा का मिनी संस्करण नहीं है।
छात्रसंघ अध्यक्ष विधायक नहीं है।
कॉलेज का परिसर चुनावी युद्धभूमि नहीं है।
और छात्र किसी दल का कैडर नहीं है।
छात्र नेता का पहला धर्म छात्रहित है।
राजनीतिक महत्वाकांक्षा बाद में।
लेकिन अगर छात्रसंघ चुनाव में राजनीतिक दल अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लें, तो फिर हार केवल उम्मीदवार की नहीं होती—सवाल उस राजनीतिक मॉडल पर भी उठता है जिसे कॉलेज परिसर में स्थापित करने की कोशिश की जा रही है, और इस चुनाव ने शायद एक बात साफ कर दी है—
सत्ता की ताकत अपनी जगह है, संगठन की ताकत अपनी जगह है, धन की ताकत अपनी जगह है…
लेकिन मतपेटी के सामने इन सबकी ताकत सीमित हो जाती है।
वहां सिर्फ एक ताकत बचती है—
छात्र का वोट।
अब देखना यह है कि चुनाव परिणाम के बाद इस वोट की इज्जत होती है या फिर शुरू होती है नई जोड़-तोड़ की राजनीति। क्योंकि अगर जीतने के बाद भी किसी निर्दलीय को राजनीतिक खेमों में बांटने की कोशिश शुरू हो गई, तो आने वाली पीढ़ी के सामने एक सवाल जरूर खड़ा होगा—
क्या छात्रसंघ चुनाव सच में छात्रों के लिए होते हैं, या राजनीतिक दलों के भविष्य के लिए? और इस सवाल का जवाब किसी मंच से नहीं मिलेगा।
जवाब मिलेगा—चुने गए प्रतिनिधि के अगले कदम से।
क्योंकि असली परीक्षा चुनाव जीतने की नहीं…
जीत के बाद अपने जनादेश के साथ खड़े रहने की है।
खबर सच है।
सवाल चुभेगा, तभी जवाब निकलेगा।